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Need :- भारत की खाद्य सुरक्षा के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन की जरूरत- डॉ.  मृणालिनी

देहरादून 17 जनवरी 2026।

डॉ. कंचेती मृणालिनी की कलम से दशकों से, भारतीय कृषि की कहानी जबरदस्त विकास की रही है। लेकिन यह प्रगति हमारे सबसे अनमोल संसाधन – मिट्टी – की कीमत पर हुई है।

आज जब हम बढ़ती आबादी और बदलते मौसम की दोहरी चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तो रासायनिक उर्वरकों को लेकर “ज्यादा ही बेहतर है” वाला दृष्टिकोण काम नहीं आ रहा है।

अपनी दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु, भारत को एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन एक ऐसी समग्र रणनीति है, जो हमारी जमीन की उर्वरता वापस लाने हेतु आधुनिक विज्ञान को पारंपरिक ज्ञान के साथ जोड़ती है।

पांव तले संकट

छोटे एवं सीमांत जोतों और नाइट्रोजन आधारित रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता भारतीय कृषि की पहचान रही है।

वर्षों तक असंतुलित उपयोग और लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी का काफी क्षरण हुआ है। अब हम “विभिन्न पोषक तत्वों की कमी” की समस्या से दो-चार हैं।

और इसकी वजह से मिट्टी में गंधक (सल्फर), जस्ता (जिंक) और बोरोन जैसे द्वितीयक और सूक्ष्म पोषक तत्वों की बहुत अधिक कमी हो गई है।

जब मिट्टी की सेहत खराब होती है, तो “कारक उत्पादकता” भी कम हो जाती है – मतलब यह कि किसानों को पूर्व में उर्वरकों के कम इस्तेमाल से हासिल होने वाली पैदावार के बराबर उपज पाने हेतु अधिक उर्वरक डालना पड़ता है।

उर्वरकों के इस्तेमाल का यह चक्र उत्पादन की लागत बढ़ा देता है और भारत की जलवायु में बेहद आम होते जा रहे अनियमित वर्षा एवं सूखे की स्थिति में फसलों को और अधिक नाजुक बना देता है।

एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन क्या है?

आईएनएम का मतलब आधुनिक उर्वरकों के उपयोग को त्यागना नहीं, बल्कि जैविक एवं जीव विज्ञान संबंधी स्रोतों के साथ मिलाकर उनका अधिक समझदारी से इस्तेमाल करना है।

यह मिट्टी के लिए एक संतुलित “आहार” जैसा है, जिसमें शामिल होते हैं:

• रासायनिक उर्वरक: मिट्टी की वास्तविक जरूरतों के आधार पर सही मात्रा में इस्तेमाल किए जाते हैं।

• जैविक खाद: खेत की खाद (एफवाईएम), कम्पोस्ट, वर्मीकम्पोस्ट और हरी खाद का इस्तेमाल करना।

• जैव उर्वरक (बायो-फर्टिलाइजर): नाइट्रोजन की मात्रा को प्राकृतिक रूप से सही करने और फास्फोरस को घुलनशील बनाने हेतु राइजोबियम, एजोटोबैक्टर और माइकोराइजा जैसे लाभदायक रोगाणुओं का उपयोग करना।

• फसलों के अवशेष: उगाए गए पदार्थों को पुनर्चक्रित करके वापस धरती में मिला देना।

मिट्टी की सेहत के आधार

आईएनएम के कारगर होने की वजह को समझने के लिए हमें मिट्टी की सेहत के तीन मुख्य आधारों – भौतिक, रासायनिक और जैविक – को देखना होगा।

1. भौतिक: आईएनएम मिट्टी की बनावट और पानी रोकने की क्षमता को बेहतर बनाता है। वर्षा पर निर्भर कृषि वाले इलाके के किसानों के लिए, इसका मतलब यह है,

कि मिट्टी स्पंज की तरह काम करती है और सूखे की अवधि में अधिक समय तक नमी बनाए रखती है।

2. रासायनिक: यह पीएच के स्तर को संतुलित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि वृहद एवं सूक्ष्म पोषक तत्व मिट्टी में अटके रहने या बह जाने के बजाय असल में पौधों की जड़ों को मिलें।

3. जैविक: शायद सबसे जरूरी बात यह है कि आईएनएम सूक्ष्मजीवों की विविधता और केंचुओं की आबादी को बढ़ाता है।

ये “छोटे इंजीनियर” पोषक तत्वों के चक्रण और चावल-गेहूं या गन्ने बेल्ट जैसी गहन प्रणालियों में उत्पादकता को बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी होते हैं।

भारतीय किसानों के लिए उत्कृष्ट कार्यप्रणाली

आईएनएम को प्रयोगशाला से खेत तक ले जाने के लिए व्यावहारिक तथा स्थान की जरूरतों के अनुरूप खास रणनीतियों की आवश्यकता है।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना जैसी राष्ट्रीय पहल पहले से ही अनुमान के बजाय मिट्टी की असली जांच के आधार पर उर्वरकों के इस्तेमाल की सलाह देकर एक रास्ता बता रही हैं।

प्रबंधन के मुख्य तरीकों में फसल के विकास के अहम चरण के हिसाब से नाइट्रोजन को बांटकर डालने और नीम-कोटेड यूरिया जैसे धीरे-धीरे छोड़े जाने वाले विकल्प का इस्तेमाल शामिल है।

चावल में पत्तियों के रंग की सारणी (एलसीसी) जैसे आसान एवं कम लागत वाले तरीके किसानों को यह तय करने में मदद करते हैं कि यूरिया कब डालना है।

इससे बर्बादी और पर्यावरण में दुष्प्रभाव कम होता है। इसके अलावा, फसल प्रणाली में फलियों को शामिल करने से नाइट्रोजन स्थिरीकरण स्वाभाविक रूप से बढ़ सकता है, जिससे पूरे प्रणाली की उत्पादकता को लाभ होता है।

क्षेत्रीय स्तर पर प्रभाव और आर्थिक लाभ

आईएनएम की अहमियत खेत के स्तर पर सबसे अधिक दिखाई देती है। देश भर में किए गए दीर्घकालिक क्षेत्रीय स्तर के प्रयोगों से पता चलता है,

कि उर्वरकों और जैविक पदार्थों का समन्वित इस्तेमाल रासायनिक उर्वरकों की तुलना में अधिक पैदावार देता है।

आम किसानों को होने वाले लाभ स्पष्ट हैं:

• कम लागत: महंगे रसायनों की जगह खेत में मिलने वाले जैविक संसाधनों का उपयोग करने से बाहरी चीजों की जरूरत कम हो जाती है।

• सुदृढ़ता: जड़ों की बेहतर वृद्धि एवं मिट्टी की अच्छी गुणवत्ता फसलों को “जलवायु की दृष्टि से अधिक सुदृढ़” बनाती है, जिससे वे सूखे की वजह उपजे दबावों को झेल पाती हैं।

• गुणवत्ता: जस्ता (जिंक) और लौह तत्व (आयरन) जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों को शामिल करने से फसल की पैदावार और उपज की गुणवत्ता, दोनों में स्पष्ट सुधार होता है।

आगे बढ़ने की एक स्थायी राह

खेत विशेष से परे, आईएनएम पर्यावरणीय स्थिरता से संबंधित भारत की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप है।

निक्षालन (लीचिंग) और वाष्पीकरण की प्रक्रिया के जरिए पोषक तत्वों की हानि को कम करके, यह तरीका पर्यावरणीय प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करता है।

जब हम भारतीय कृषि के भविष्य की ओर देखते हैं, यह साफ हो जाता है कि हम अपनी मिट्टी का अनिश्चित काल तक “दोहन” कतई नहीं कर सकते।

एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन बड़े पैमाने पर अपनाए जाने योग्य एवं किसानों पर केन्द्रित एक ऐसा रास्ता है, जो हमारी खेती की प्रणालियों का आने वाली पीढ़ियों तक प्रासंगिक बने रहना सुनिश्चित करता है।

अब समय आ गया है कि हम अपनी मिट्टी को सिर्फ धूल भर न समझें, बल्कि एक ऐसी जीवंत प्रणाली समझें जिसे देश के लोगों का पेट भरने के लिए संतुलित एवं टिकाऊ पोषण की जरूरत है।

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