भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आवारा कुत्तों से जुड़े मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण और सराहनीय फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने अपने पूर्व के आदेश को संशोधित करते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है।
इसके साथ ही, हिंसक और बीमार कुत्तों को शेल्टर होम में रखने का आदेश दिया गया है,
ताकि आम जनमानस को कुत्तों के हमलों से बचाया जा सके और रेबीज जैसी घातक बीमारी पर अंकुश लगाया जा सके।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जिन गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को कुत्तों को गोद लेने या उनकी देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी गई है,
उन्हें अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह से निभानी होगी। यदि किसी एनजीओ के संरक्षण में मौजूद कुत्ते के कारण कोई अप्रिय घटना होती है,
तो उसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित एनजीओ और उसके स्वामी की होगी। यह कदम पशु कल्याण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में जोर दिया कि आम लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि है। दिल्ली-एनसीआर सहित देश भर में आए दिन कुत्तों के काटने की घटनाएं सामने आ रही हैं,
जिनमें बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों के अनुसार,
भारत में हर साल रेबीज से होने वाली मौतों का एक तिहाई हिस्सा आवारा कुत्तों के काटने के कारण होता है।
कोर्ट ने स्थानीय निकायों की निष्क्रियता पर भी नाराजगी जताई और कहा कि अगर समय पर नसबंदी और टीकाकरण जैसे कदम उठाए गए होते, तो यह स्थिति नहीं आती।
कोर्ट ने हिंसक और बीमार कुत्तों को शेल्टर होम में रखने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
इन शेल्टर होम्स में पेशेवर कर्मचारियों की नियुक्ति, नसबंदी, टीकाकरण और सीसीटीवी निगरानी की व्यवस्था अनिवार्य होगी,
ताकि कुत्तों की उचित देखभाल सुनिश्चित हो और वे वहां से भाग न सकें।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी कुत्ते को गोद लेने की अनुमति तभी दी जाएगी,
जब शेल्टर होम में सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हों।
इस फैसले का कुछ पशु कल्याण संगठनों और कार्यकर्ताओं ने विरोध किया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में तर्क दिया कि शेल्टर होम में कुत्तों को रखने से उनकी मानसिक स्थिति खराब हो सकती है, और यह पशु अधिकारों का हनन है।
पशु प्रेमी संगठनों का कहना है कि नसबंदी और टीकाकरण के जरिए आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करना अधिक मानवीय और प्रभावी समाधान है।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानव सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी और इस प्रक्रिया में किसी भी बाधा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस आदेश पर राजनीतिक हलकों में भी बहस छिड़ गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने इसे “क्रूर और अव्यावहारिक” बताते हुए।
कहा कि नसबंदी और सामुदायिक देखभाल जैसे मानवीय उपायों पर ध्यान देना चाहिए।
वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने भी इस फैसले की आलोचना की और कहा कि लाखों कुत्तों के लिए पर्याप्त शेल्टर होम बनाना संभव नहीं है।
दूसरी ओर, दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा ने कोर्ट के आदेश का स्वागत किया और इसे समयबद्ध तरीके से लागू करने का आश्वासन दिया।
सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला न केवल दिल्ली-एनसीआर, बल्कि पूरे देश में आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए एक ठोस कदम साबित हो सकता है।
कोर्ट ने स्थानीय निकायों और प्रशासन को निर्देश दिया है कि वे इस आदेश का कड़ाई से पालन करें और 8 सप्ताह के भीतर शेल्टर होम की व्यवस्था को मजबूत करें।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला रेबीज और कुत्तों के हमलों की घटनाओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, बशर्ते इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
यह आदेश निसंदेह जन सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो मानव और पशु कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश करता है। इस फैसले के दीर्घकालिक प्रभावों पर सभी की निगाहें टिकी हैं।
नोट- यह खबर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस मुद्दे पर अपनी राय साझा करें और पशु कल्याण व जन सुरक्षा के संतुलन पर विचार करें।