देहरादून 06 अप्रैल 2026।
भारत सरकार द्वारा पूरे देश में जनगणना की प्रक्रिया विधिवत रूप से प्रारंभ की जा चुकी है।
यह सर्वविदित है कि जनगणना के दूसरे चरण में व्यक्ति की गणना उसी स्थान पर की जाती है, जहाँ वह गणना के समय उपस्थित होता है,
और आगामी दस वर्षों तक उसी स्थान को जनसंख्या आधारित अनेकानेक विकास योजनाओं के लाभ प्राप्त होते हैं।
जनगणना के आधार पर न केवल पंचायतों, नगर निकायों और जिलों के बजट निर्धारित होते हैं,
बल्कि भारत सरकार और राज्य सरकार की अधिकांश जनसंख्या-आधारित योजनाएँ, तथा लोकसभा, विधानसभा, नगर निकाय एवं पंचायतों का परिसीमन भी इसी पर निर्भर करता है।
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों से निरंतर हो रहा पलायन राज्य के समक्ष अब केवल सामाजिक या आर्थिक नहीं, बल्कि गंभीर राजनीतिक और संवैधानिक संकट का रूप ले चुका है।
इसका सबसे प्रत्यक्ष और दूरगामी प्रभाव आगामी परिसीमन में पर्वतीय जिलों की विधानसभा सीटों में भारी कटौती के रूप में सामने आने वाला है।
सभी को भली-भांति पता हैं कि भारत सरकार द्वारा अगला परिसीमन 2011 की जनसंख्या के आधार पर संभावित है।
यदि पूर्ववर्ती परिसीमन की तरह इस बार का परिसीमन उसी फार्मूले पर किया जाता है,
तो इसके परिणाम उत्तराखंड राज्य-निर्माण के मूल उद्देश्यों के विपरीत होंगे। राज्य निर्माण के बाद अब तक हुए परिसीमन और आगामी संभावनाओं को संलग्न जनसंख्या,
एवं विधानसभा सीट आवंटन तालिका से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। यह तालिका यह स्पष्ट करती है।
कि 2011 की जनसँख्या पर 105 सीटों के परिसीमन की दशा में 9 पर्वतीय जिलों की विधानसभा सीटें 46 और 4 मैदानी जिलों की सीटें 59 तक पहुँच सकती हैं।
पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में बाहर से सितंबर 2020 तक लगभग 4 लाख प्रवासी अस्थायी रूप से अपने गाँवों में लौटे थे।
इसके अलावा पर्वतीय जिलों से पलायन करने वाले 70 प्रतिशत लोग राज्य के मैदानी शहरों में ही रह रहे हैं जिनकी संख्या लगभग 15 से 20 लाख होगी।
यदि राज्य के अंदर और राज्य के बाहर रहने वाले प्रवासियों से सही समय पर संपर्क साध कर सही रणनीति के साथ जनगणना के लिए अपने गाँव आने की अपील की जाए,
तो इससे पर्वतीय जिलों की जनसंख्या गणना में 10 से 12 लाख का निर्णायक अंतर आ सकता है, जो विधानसभा सीटों के असंतुलन को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
हमारे युवा मुख्यमंत्री के नेतृत्व में आयोजित इन्वेस्टर समिट, प्रवासी सम्मेलन और देश-विदेश में बसे उत्तराखंडियों से निरंतर संवाद के कारण प्रवासी समाज में उनके प्रति गहरा विश्वास रखते है।
यदि राज्य सरकार के स्तर से “अपनी गणना अपने गाँव का स्पष्ट, भावनात्मक और संगठित आह्वान किया जाए, तो लाखों प्रवासी स्वेच्छा से अपने गाँवों में आकर जनगणना करवाने को तैयार होंगे।
इस एक निर्णय से पर्वतीय जिलों का विधानसभा प्रतिनिधित्व सुरक्षित हो सकेगा, पर्वतीय अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष बल मिलेगा, और आने वाली पीढ़ियों के लिए राज्य के संतुलित विकास की नींव रखी जा सकेगी।
यह समय साधारण प्रशासनिक निर्णय का नहीं, बल्कि राज्य के भविष्य से जुड़े ऐतिहासिक हस्तक्षेप का है।
हमें पूर्ण विश्वास है कि इस विषय की गंभीरता को समझते हुए शीघ्र ठोस पहल हो, जो उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों और भावी पीढ़ियों के लिए दूरगामी महत्व रखेगी।
हमारा यह भी अनुरोध है कि हमारे एक शिष्ठमण्डल को मुख्यमंत्री के साथ इस संदर्भ में वार्ता हेतु मुलाकात कारवाई जाए।
ज्ञापन देने वालों में डॉ. आर. पी. रतूड़ी,मथुरा दत्त जोशी,जय सिंह रावत ,मुख्य संयोजक जोत सिंह बिष्ट,बिजेंद्र सिंह रावत,पी सी नैनवाल,
रोशन लाल सेमवाल,बीर सिंह नेगी,हेमराज हेर,शीशपाल सिंह गुसाईं,शांति रावत,मनोहर लाल,सोहन लाल खंडूरी पूर्ण सैनिक, सत्यदेव उनियाल,शीला वधानी हिमानी,दिनेश बडोनी आदि।
