पर्यावरण और वन संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए पद्मभूषण से सम्मानित प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. अनिल कुमार जोशी पर उत्तराखंड वन विभाग ने गंभीर आरोप लगाते हुए नोटिस जारी किया है।
विभाग ने दावा किया है कि डॉ. जोशी ने अर्काेडिया बीट आशारोड़ी रेंज में के पास रिजर्व HESCO NGO ने फॉरेस्ट लैंड पर अतिक्रमण किया है, जहां उन्होंने बिना अनुमति के निर्माण कार्य कराया।
इस घटना ने पर्यावरण हलकों में हड़कंप मचा दिया है, क्योंकि डॉ. जोशी को ‘ग्रीन मैन ऑफ इंडिया’ के रूप में जाना जाता है और वे उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं विकास संगठन हेस्को के संस्थापक हैं।
पद्मभूषण अनिल जोशी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अपना पक्ष रखा है और कहा है कि यह एक गलतफहमी है।
आरोपों का विवरण
उत्तराखंड वन विभाग के प्रभागीय वन अधिकारी (डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर) ने 18 जनवरी 2026 को डॉ. अनिल जोशी को नोटिस जारी किया।
नोटिस में कहा गया है कि मसूरी वन रेंज के अंतर्गत आने वाले रिजर्व फॉरेस्ट एरिया (जिसकी कुल क्षेत्रफल लगभग 5 एकड़ है) पर डॉ. जोशी ने अवैध रूप से कब्जा किया है। विभाग के अनुसार,
इस भूमि पर बिना पर्यावरणीय मंजूरी या वन संरक्षण अधिनियम (1980) के तहत अनुमति के निर्माण कार्य चल रहे हैं,
जिसमें एक छोटा सा सामुदायिक केंद्र या पर्यावरण जागरूकता केंद्र बनाने का प्रयास शामिल है।
वन विभाग की जांच टीम ने साइट का दौरा किया और पाया कि भूमि पर पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाया गया है, जो वन्यजीव संरक्षण के नियमों का उल्लंघन है।
वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह भूमि सरकारी रिजर्व फॉरेस्ट का हिस्सा है, जो संरक्षित है।
किसी भी प्रकार का निर्माण या उपयोग वन संरक्षण कानून के बिना प्रतिबंधित है।
हमने नोटिस जारी कर 15 दिनों के अंदर स्पष्टीकरण मांगा है, अन्यथा कानूनी कार्रवाई की जाएगी।” यह आरोप भारतीय वन अधिनियम, 1927 और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत दर्ज किया गया है।
विभाग ने स्थानीय प्रशासन को भी सूचित किया है और यदि आवश्यक हुआ तो भूमि को मुक्त कराने के लिए ड्राइव चलाने की योजना बनाई है।
यह मामला तब और संवेदनशील हो गया है क्योंकि उत्तराखंड में वन भूमि पर अतिक्रमण एक पुरानी समस्या है,
और हाल ही में कई हाई-प्रोफाइल मामलों में वन विभाग सक्रिय हुआ है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का एक वर्ग इसे ‘राजनीतिक साजिश’ बता रहा है, जबकि कुछ इसे विभाग की सख्ती का उदाहरण मान रहे हैं।
पद्मभूषण डॉ. अनिल कुमार जोशी ने 19 जनवरी को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन आरोपों पर अपना पक्ष रखा।
उन्होंने कहा, “मैंने कभी भी वन भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया। यह भूमि वास्तव में मेरे संगठन के नाम पर ली गई थी,
जो 1990 के दशक में राज्य सरकार से वन विभाग की सहमति से पर्यावरण संरक्षण के लिए आवंटित की गई थी।
हमने यहां वृक्षारोपण और जागरूकता केंद्र स्थापित किया था, जो पूर्णतः कानूनी है। हाल ही में कुछ मरम्मत कार्य चल रहे थे,
जो विभाग की पूर्व अनुमति पर आधारित हैं। यह नोटिस एक गलतफहमी का परिणाम लगता है, शायद दस्तावेजों में कोई त्रुटि हो।”
डॉ. जोशी ने आगे कहा, “मैंने जीवन भर वनों की रक्षा की है। 1972 से पर्यावरण आंदोलनों में सक्रिय हूं और चिपको आंदोलन से प्रेरित होकर हेस्को की स्थापना की।
पद्मभूषण (2023) जैसे सम्मान मेरे काम का प्रमाण हैं। यदि कोई कानूनी प्रक्रिया हो, तो मैं सभी दस्तावेज पेश करने को तैयार हूं।
यह आरोप मेरे जैसे कार्यकर्ता के लिए दुखद है, लेकिन मैं इससे पीछे नहीं हटूंगा।” उन्होंने वन विभाग से अपील की कि मामले की निष्पक्ष जांच हो और यदि कोई अनियमितता साबित हो तो वे खुद ही सुधार करेंगे।
डॉ. जोशी के समर्थकों ने सोशल मीडिया पर अभियान चलाया है, जहां #StandWithAnilJoshi जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।
कई पर्यावरण संगठन, जैसे WWF इंडिया और ग्रीनपीस, ने उनका समर्थन किया है और विभाग से तथ्यों की जांच की मांग की है।
पृष्ठभूमि और विवाद का संदर्भ
डॉ. अनिल कुमार जोशी उत्तराखंड के एक प्रमुख पर्यावरणविद् हैं, जिन्होंने मसूरी और देहरादून क्षेत्र में वनों की रक्षा के लिए कई अभियान चलाए हैं।
वे HESCO के माध्यम से हजारों पेड़ लगाए हैं और जल संरक्षण परियोजनाओं में योगदान दिया है।
2023 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया, जो उनके 50 वर्षों के कार्य का सम्मान था।
हालांकि, वन भूमि आवंटन को लेकर अतीत में भी छोटे-मोटे विवाद हुए हैं, लेकिन यह पहली बार है जब इतना गंभीर नोटिस जारी हुआ है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में वन भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ चल रही ड्राइव में यह मामला फंस गया है।
राज्य सरकार ने हाल ही में ‘वन भूमि संरक्षण अभियान’ शुरू किया है, जिसमें 10,000 एकड़ से अधिक भूमि को मुक्त करने का लक्ष्य है।
वन मंत्री ने कहा, “कानून सबके लिए बराबर है, चाहे वह कोई भी हो। जांच पूरी होने के बाद ही फैसला होगा।”
आगे की कार्रवाई और प्रतिक्रियाएं
वन विभाग ने नोटिस के जवाब का इंतजार कर रहा है। यदि डॉ. जोशी संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं देते, तो मामला अदालत जा सकता है,
जहां जुर्माना या भूमि जब्ती की कार्रवाई हो सकती है। पर्यावरण मंत्रालय ने भी मामले पर नजर रखी है।
विपक्षी दलों ने इसे ‘पर्यावरण कार्यकर्ताओं को दबाने की साजिश’ बताया है, जबकि सत्ताधारी पक्ष ने कहा कि कानून का पालन जरूरी है।
यह घटना पर्यावरण संरक्षण और कानूनी प्रक्रियाओं के बीच संतुलन की बहस को जन्म दे रही है।
डॉ. जोशी जैसे सम्मानित व्यक्ति पर लगे आरोप न केवल उनके कार्य को प्रभावित करेंगे, बल्कि पूरे पर्यावरण आंदोलन पर सवाल उठा सकते हैं।