जीवन में सफलता का रास्ता कभी सीधा नहीं होता। असफलताएं, चुनौतियां और निराशाएं हर किसी के जीवन का हिस्सा होती हैं, लेकिन जो व्यक्ति हार मानने के बजाय लगातार आगे बढ़ता रहता है,
वही अंततः अपनी पहचान बनाता है। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है देहरादून की प्रियांशी रावत की, जिन्होंने अनेक असफलताओं के बावजूद अपने सपनों और हौसलों को टूटने नहीं दिया।
प्रियांशी रावत, प्रसिद्ध फुटबॉल खिलाड़ी, रेफरी, इंटरनेशनल कोच, राज्य आंदोलनकारी एवं सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. विरेन्द्र सिंह रावत की बड़ी पुत्री हैं।
वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य गठन की घोषणा वाले दिन उनका जन्म देहरादून के दून अस्पताल में हुआ था।
बचपन से ही मेधावी रही प्रियांशी ने 10वीं, 12वीं, बीएससी और एमएससी (गणित) में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।
उनका सपना आईआईटी से कंप्यूटर साइंस में बीटेक करने का था। उन्होंने दो बार आईआईटी प्रवेश परीक्षा दी और सामान्य वर्ग में पात्रता भी हासिल की,
लेकिन मामूली अंतर से कटऑफ से पीछे रह गईं। इससे वह काफी निराश हुईं, लेकिन परिवार ने उनका मनोबल बनाए रखा।
इसके बाद उन्होंने भारतीय वायुसेना के एफ-कैट (AFCAT) परीक्षा में अपना भाग्य आजमाया। आठ बार परीक्षा देने के दौरान हर बार लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की,
कई बार एसएसबी और मेडिकल परीक्षण भी सफलतापूर्वक पास किए, लेकिन अंतिम मेरिट सूची में बेहद कम अंतर से चयन से चूक गईं।
इसके बाद बैंक पीओ और एलआईसी अधिकारी स्तर की परीक्षाओं में भी उन्होंने प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली।
लगातार असफलताओं के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और शिक्षा के क्षेत्र को अपना कर्मक्षेत्र बना लिया।
आज प्रियांशी रावत छात्रों को गणित, अंग्रेजी, सामान्य ज्ञान, विज्ञान, एसएसबी, एनडीए, सीडीएस, सैनिक स्कूल और आरआईएमसी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवा रही हैं।
उनके पढ़ाए हुए कई छात्र भारतीय सेना में चयनित हो चुके हैं। इसके साथ ही वह बीएड की पढ़ाई भी कर रही हैं।
प्रियांशी ने अपने पिता की देहरादून फुटबॉल अकादमी में समन्वयक के रूप में भी कार्य किया और एनसीसी में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया।
वर्तमान में वह ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से मोटिवेशनल स्पीकर, काउंसलर, मेंटर और एंकर के रूप में युवाओं का मार्गदर्शन कर रही हैं।
बच्चों को निराशा से बचाने की जरूरत: डॉ. रावत
डॉ. विरेन्द्र सिंह रावत का कहना है कि बच्चों के भविष्य निर्माण में माता-पिता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
यदि बच्चों को अच्छे संस्कार, सही मार्गदर्शन और समय-समय पर प्रोत्साहन मिले तो वे जीवन में कभी भटकते नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि आजकल प्रतियोगी परीक्षाओं में असफलता या पेपर लीक जैसी घटनाओं के बाद कई युवा निराश होकर गलत कदम उठा लेते हैं।
ऐसे युवाओं को प्रियांशी की कहानी से प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन में सफलता पाने के कई रास्ते होते हैं।
यदि एक लक्ष्य पूरा न हो तो दूसरे रास्ते तलाशने चाहिए, लेकिन मेहनत और जुनून नहीं छोड़ना चाहिए।
संघर्षों से भरा रहा डॉ. रावत का जीवन
डॉ. रावत ने अपने जीवन के संघर्षों का उल्लेख करते हुए बताया कि वर्ष 1989 में पोस्ट ऑफिस में हेड पोस्टमास्टर पद के लिए सभी परीक्षाएं पास करने के बावजूद उनसे रिश्वत मांगी गई।
आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह रिश्वत नहीं दे सके और नौकरी किसी अन्य को दे दी गई।
इसी प्रकार पीडब्ल्यूडी और रेलवे में भी चयन प्रक्रिया के दौरान कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
उन्होंने कहा कि इन सब चुनौतियों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। फुटबॉल के विकास के लिए नौकरी छोड़ी,
आर्थिक कठिनाइयां झेलीं, कर्ज लिया, जमीन बेची, संघर्ष किया और अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटे।
युवाओं के लिए संदेश
डॉ. रावत और उनकी बेटी प्रियांशी की कहानी यह संदेश देती है कि असफलता अंत नहीं होती।
यदि व्यक्ति अपने हौसले बुलंद रखे और निरंतर प्रयास करता रहे तो सफलता किसी न किसी रूप में अवश्य मिलती है।
“रास्ते बदलो, लेकिन लक्ष्य नहीं। इरादे बदलो, लेकिन जुनून नहीं। जीवन अमूल्य है, इसलिए कभी निराश मत हो और कर्म करते रहो। सफलता एक दिन जरूर मिलेगी।”