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DehradunNews:-कुंडलिनी जागृत करने के फ़ायदे

देहरादून – कुंडलिनी जागृत करने की इच्छा रखने वाले साधक को प्रतिदिन भस्रिका प्राणायाम, कपालभाति, बाह्य प्राणायाम और ओंकार के जप (ध्यान) का तात्पर्य यही है कि ‘प्राण’ को निम्न स्तर से उठाकर उच्च स्तर में ले जाया जाये।

‘बुद्धि एवं मन’ को प्राण के क्रियामय क्षेत्र से उठाकर ‘विज्ञानमय कोश’ के तथा ‘मन-बुद्धि’ को ‘आनन्दमय कोश’ के स्तर पर लाकर स्थिर कर दिया जाये।

इसका अर्थ है- क्रमशः देह, प्राणादि के अभ्यास का अभाव करते हुए ‘प्राणमय’, ‘मनोमय’, ‘विज्ञानमय’ कोशों को लांघते हुए शरीर में फैली ‘आत्मचेतना’ को समेटकर, ‘आनन्दानुगत’ तथा’ अस्मितानुगत’ समाधियों में स्थिर कर देना अथवा स्वयं उसमें स्थित हो जाना।

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प्रणव के अलावा वेदों के सबसे महान् मन्त्र गायत्री का ध्यान किया जा सकता है। साधक चित्र के अनुसार अपने मस्तिष्क में कपाल के अन्दर ध्यान की दृष्टि से देखने का प्रयास करे।

और ‘ध्यान’ करे कि मेरा मस्तिष्क इस समय ‘दिव्य प्रकाश’ से भर रहा है, अब परिपूर्ण हो गया है, मेरे बसन्ती- सुनहरे रंगवाले बुद्धिमण्डल में (2) टॉर्च के समान बँधी दिव्यलोक से आ रही चाँदनी जैसी एक अति धवल ज्योति प्रविष्ट हो रही है।

विज्ञानमय कोश की स्वामिनी बुद्धि के परम सात्त्विक समुज्ज्वल बन जाने से इन्द्रियराज ‘मन’ एवं उसकी अधीनस्थ ‘इन्द्रियाँ’ स्वतः निर्मल शुद्ध-पवित्र बनती जा रही हैं। ऐसी स्थिति में दिन-रात मस्तिष्क और हृदय में आनन्द एवंपरमशान्त अपार ज्योति का पारावार हिलोरें लेता रहता है।

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ओंकार जप या गायत्री जप के अलावा साधक चाहे तो ‘दिव्य आलोक’ का ध्यान कर सकता है। महातेजस्वी सहस्त्राक्ष भगवान् (1) मुझे ‘ब्रह्मतेज’ प्रदान कर रहे हैं और ब्रह्मतेज हृदय में सूर्य (2) के समान देदीप्यमान हो रहा है।

और विशुद्ध सौम्य ज्योति के रूप में वह ईश मेरे समक्ष है, मेरी आत्मा (3) में प्रकट है। यह दिव्यतम ज्योति मेरे जीवन-पथ को आलोकित करती हुई जीवन पर्यन्त मेरे समक्ष, मेरे साथ बनी रहे. यही कामना होनी चाहिए।

 

 

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