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Freeze:- आखिर क्यों बैंक आपका खाता फ्रीज नहीं कर सकता

जयपुर 30 अक्टूबर 2025।

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस या जांच एजेंसी एक साधारण पत्र के आधार पर बैंक किसी भी व्यक्ति के पूरे खाते को बिना सबूत के फ्रीज नहीं कर सकता।

यह फैसला जयपुर के एक साधारण कचौड़ी विक्रेता पदम कुमार जैन के मामले में आया है, जहां उनके बैंक ऑफ महाराष्ट्र के खाते को साइबर फ्रॉड के एक छोटे से लेन-देन के बहाने बंद कर दिया गया था।

कोर्ट ने न केवल पदम कुमार के खाते को तत्काल खोलने का आदेश दिया, बल्कि पूरे देश स्तर पर ऐसी कार्रवाइयों के लिए दिशानिर्देश बनाने की मांग भी की है।

मामले की पृष्ठभूमि: एक छोटा लेन-देन जो जीवन भर की परेशानी बन गया

पदम कुमार जैन, जयपुर के एक छोटे से कचौड़ी विक्रेता हैं, जो अपनी दैनिक कमाई से परिवार चलाते हैं।

अगस्त 2025 में, उनके बैंक ऑफ महाराष्ट्र के खाते में एक संदिग्ध लेन-देन की रिपोर्ट आई। यह लेन-देन मात्र 5,000 रुपये का था, जो तेलंगाना पुलिस की एक साइबर क्राइम जांच से जुड़ा था।

तेलंगाना में राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीसीआरपी) पर दर्ज शिकायत के अनुसार, कुछ अज्ञात साइबर अपराधियों ने करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी की थी,

और उसी फंड का एक हिस्सा पदम कुमार के खाते से गुजरा था।

जयपुर पुलिस ने तेलंगाना पुलिस के अनुरोध पर बैंक को पत्र लिखा, जिसके आधार पर बैंक ने बिना किसी पूर्व सूचना के पदम कुमार का पूरा खाता फ्रीज कर दिया।

इससे उनकी दैनिक कमाई रुक गई, परिवार की आजीविका पर संकट आ गया। पदम कुमार ने बताया, “मेरा खाता मेरी जिंदगी है।

कचौड़ी बेचने की कमाई उसी में आती-जाती है। बिना किसी गलती के यह बंद हो जाना मेरे लिए तबाही जैसा था।”

वे अपने वकील अक्षत शर्मा के माध्यम से राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर करने पहुंचे।

कोर्ट की कार्यवाही: सवाल उठे साइबर जांच की मनमानी पर,

हाईकोर्ट की सिंगल बेंच, जिसमें जस्टिस अनूप कुमार धांड अध्यक्षता कर रहे थे, ने 3 सितंबर 2025 को इस मामले की सुनवाई की।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गहन जांच की और पाया कि पदम कुमार के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है।

बैंक की ओर से हिमांशु थोलिया ने बचाव किया कि कार्रवाई तेलंगाना पुलिस के पत्र और गृह मंत्रालय के स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) के अनुसार की गई थी।

लेकिन कोर्ट ने सवाल उठाया: “क्या मात्र एक संदिग्ध लेन-देन के आधार पर किसी निर्दोष व्यक्ति का पूरा खाता बंद किया जा सकता है?

क्या यह दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 102 का उल्लंघन नहीं है?”

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने बताया कि डीजीपी साइबर क्राइम ने 9 मई 2025 को छह बिंदुओं वाले दिशानिर्देश जारी किए हैं,

जो दिल्ली और कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देशों पर आधारित हैं। इनमें जांच एजेंसियों को बैंक खातों को फ्रीज करने के लिए सतर्क रहने का आदेश दिया गया है।

हालांकि, अन्य राज्यों की जांच एजेंसियों से आने वाली शिकायतों पर राष्ट्रीय स्तर का एसओपी गृह मंत्रालय द्वारा तैयार किया जा रहा है।

कोर्ट ने आरबीआई को भी आवश्यक पक्ष बनाया, क्योंकि बैंकिंग व्यवस्था का नियमन उसी के हाथ में है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि हजारों निर्दोष खाताधारक ऐसी मनमानी कार्रवाइयों के शिकार हो रहे हैं, जो उनकी आर्थिक आजीविका को नष्ट कर देती हैं।

जस्टिस धांड ने कहा, “एक छोटे व्यापारी का खाता बंद करना उसके पूरे परिवार को सजा देना है। सबूत के बिना ऐसी कार्रवाई असंवैधानिक है।”

कोर्ट के आदेश: तत्काल राहत और शर्तें फैसले में कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए:

बैंक ऑफ महाराष्ट्र को पदम कुमार जैन के खाते को तत्काल डी-फ्रीज करने और संचालन की अनुमति देने का आदेश।

विवादित 5,000 रुपये की राशि को मूल खाते में वापस स्थानांतरित करने की छूट बैंक को।

पदम कुमार को जांच एजेंसी के साथ पूर्ण सहयोग करने का निर्देश, और खाता बंद न करने की शर्त।

यदि बाद में उनकी संलिप्तता साबित होती है, तो वे राशि लौटाने और कानूनी कार्रवाई के लिए उत्तरदायी होंगे।

गृह मंत्रालय और आरबीआई से साइबर क्राइम मामलों में खातों को फ्रीज करने के दिशानिर्देश मांगे गए।

कोर्ट ने मामले को व्यापक बनाते हुए साइबर क्राइम जांच में खातों की जब्ती की वैधता पर बहस की।

अगली सुनवाई अक्टूबर 2025 के पहले सप्ताह में निर्धारित की गई है, जिसमें वकीलों से सुझाव मांगे जाएंगे।

व्यापक प्रभाव: निर्दोषों के लिए न्याय की नई उम्मीद

यह फैसला न केवल पदम कुमार के लिए राहत है, बल्कि पूरे देश के लाखों खाताधारकों के लिए मिसाल कायम करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जांच एजेंसियां अधिक सतर्क होंगी और बिना सबूत के फ्रीजिंग रुकेगी।

सुप्रीम कोर्ट और अन्य हाईकोर्ट्स में भी ऐसे मामले लंबित हैं, जहां निर्दोष व्यापारी और व्यक्ति आर्थिक संकट झेल रहे हैं।

गृह मंत्रालय के प्रस्तावित राष्ट्रीय एसओपी से इस समस्या का समाधान हो सकता है।

पदम कुमार ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “कोर्ट ने मेरी जिंदगी वापस ला दी। अब मैं बिना डर के अपना कारोबार चला सकूंगा।”

यह फैसला न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करता है, जो व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा में जांच एजेंसियों की मनमानी को रोक रही है।

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