“गुमानी पंत पुरस्कार”
(कुमाउंनी बोली- भाषा में दीर्घकालीन साहित्य सेवा के लिए )
देहरादून – जनकवि गुमानी पंत की जीवनी इस प्रकार से है उनका का जन्म 27 फरवरी, 1790 में काशीपुर वर्तमान उधमसिंहनगर में हुआ था। अपने परिवार की परम्परानुसार गुमानी सर्वप्रथम राजकवि के रूप में काशीपुर नरेश गुमान सिंह देव की राजसभा में नियुक्त हुए थे।
तत्कालीन अन्य राजाओं द्वारा भी उन्हें सम्मान प्राप्त हुए थे। गुमानी अभी तक ज्ञात कुमाउँनी के प्राचीनतम लेखक हैं। उनकी कृतियाँ कुमाऊँ में पर्याप्त लोकप्रिय है। ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि कुमाऊँ का शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो उन्हें न जानता हो।
जनकवि गुमानी विरचित ग्रन्थों की संख्या लगभग 18 बताई जाती है। जिसमें गंगा शतक कृष्णाष्टक, नीतिशतक, शतोपदेश, ज्ञान भैषज्य मंजरी आदि प्रमुख है। कुछ रचनाएं निर्णय सागर प्रेस बम्बई से प्रकाशित “काव्य माला में भी है। यद्यपि जनकवि गुमानी ने अनेक ग्रन्थों की रचना की किन्तु वे मूलतः संस्कृति के कवि थे। नेपाली में भी उन्होंने कुछ रचनाएं की है। गुमानी आशु कवि थे तत्कालीन सामाजिक तथा राजनैतिक परिस्थितियों का सम्यक ज्ञान रखते थे। उनके कृतित्व में औपनिवेशिक शासन के कुप्रभावों तथा समाज में व्याप्त कुरीतियों की सटीक आलोचना दृष्टिगत चूंकि गुमानी ने गोरखाओं का अत्याचारी शासन, अंग्रेजी शासन का दमन चक्र व बेगार की पीडा को स्वयं देखा था अतः व्यग्यात्मक स्वरों में उसका चित्रण किया। गुमानी का मानना था यदि आपसी फूट न होती तो भारत में अंग्रेजी शासन भारत में स्थापित न होता। उनकी चार पंक्तियां इस प्रकार से है
“बादशाह दिल्ली में होता फूट न होती राजन में,
हिन्दुस्तान मुशकल होता वश करना मुद्दतन में,
कहै गुमानी अंग्रेजन से कर लो चाहो जो मन में,
धरती में नहीं वीर तमाशा तुमै दिखाता जो रण में।
यह पंक्तियाँ 1857 में प्रथम स्तंत्रता संग्राम से लगभग 37 साल पहले 1820 में रची गई। जब कम्पनी शासन के विरुद्ध असंतोष भले ही जन्म लेने लगा हो लेकिन इस के व्यापक प्रचार-प्रत्तार में अभी दे थी। इस पुरानी कविता से यह भी सिद्ध होता है कि उस समय भी गुमानी जैसे रचनाकार अपने-अपने क्षेत्रों में औपनिवेशिक सत्ता का चरित्र जनता के सामने प्रस्तुत कर रहे होंगे। किन्तु पर्याप्त संसाधनों के अभाव में न तो जनता तक पहुँच सके न ही चर्चा में आ सके।
कालान्तर में गुमानी ने अंग्रेजी व्यवस्था को ‘कलियुग’ कहा। अंग्रेजी राज्य व्यवस्था की जो खामिया गुमानी ने दिखाने का प्रयास किया वे आज भी प्रासागिक है। एक अन्य रचना में कवि ने भारत पर अधिकार की घटना को इस प्रकार व्यक्त किया है।
“विल्लायत से चला फिरंगी, पहिले पहुँचा कलकत्ते।
अजब टोप बन्नाती कुर्ती न कपडे कुछ न लत्ते।
गुमानी का युग राजनैतिक उथल पुथल का युग था। उन्होंने अपनी कविताओं में उस उथल-पुथल को उतारा। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से 11 वर्ष पूर्व ही उनका निधन हो चुका था परन्तु उनकी रचनाएँ इस तथ्य की परिचायक है कि उनकी सोच समय से कितनी आगे थी।
गुमानी पंत पुरस्कार देवकी नंदन भट्ट ‘मयंक’ को मिला।
देवकी नंदन भट्ट ‘मयंक’ का जीवन परिचय
पिता का नाम लोकमणी भट्ट,माता का नाम सरस्वती देवी।
जन्मतिथि15 अगस्त, 1948,
स्थायी निवास का पता
ग्राम- गोजाजाली (द०) पोस्ट-अर्जुनपुरा, तीनपानी, हल्द्वानी (नैनीताल) पिन-263139, वार्डः 61
उनका कार्यक्षेत्र सीनियर इंस्पेक्टर (टैकनिकल) सी. सु. ब. (से. नि.)
शिक्षा एम.ए. (हिन्दी साहित्य)
पूर्व में प्राप्त सम्मान
अजंता प्रकाशन जबलपुर से ‘साहित्य प्रभाकर नवांकुर साहित्य परिषद फैजाबाद से साहित्य वास्पति रानी गुजरी प्रकाशन ग्वालियर से साहित्य सौरभ तरूण मिलाप जालंधर से ‘साहित्य मार्तण्ड आकाशवाणी जम्मू से ‘प्रगतिवादी साहित्यकार डीजी.सी.सु.ब. का कमंडेशन सार्टिफिकेट सहित नकद पुरस्कार 1973
प्रकाशित पुस्तकों के नाम
कुमाउंनी भाषा/लोक साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसार देवी से 14 लेख पुरस्कृत तथा गंगा अधिकारी स्मृति नकद पुरस्कार
शिखरों के स्वर (कुमाउंनी लोकगीत संग्रह 1971 उड़ता आंचल (कहानी संग्रह) पलायन पर 1972, बलिक बकार (नाटक), कि मैं झुठ बोलिया? (हिन्दी हास्य व्यंग्य काव्य संग्रह), कौवा पुराण (कुमाउंनी चम्पू काव्य), मेरे लोक-मेरे गीत (कुमाउंनी लोकगीत), ऐडीकोटक ऐडी (कुमाउंनी रहस्य-रोमांचक उपन्यास), स्याल्दे-बिखोती मां बराही (म्यालों पर डाक्यूमेंट्री)
