अरावली की पहाड़ियाँ दिल्ली और उसके आसपास की इकोलॉजी का एक बहुत बड़ा हिस्सा हैं,
और इनका विनाश उत्तर भारत के लिए बहुत गंभीर खतरा है। चलिए इसे थोड़ा डॉ. राजीव दीक्षित के अनुसार विस्तार से समझते हैं।
अरावली का ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्व!
दिल्ली में अरावली हाँ, रायसीना हिल (जहाँ राष्ट्रपति भवन, संसद भवन आदि हैं), मलाई मंदिर (चट्टानगढ़) और कालकाजी मंदिर जैसे कई स्थल अरावली की ही उथली पहाड़ियों पर बने हैं।
दिल्ली रिज भी अरावली का ही हिस्सा है। ये पहाड़ियाँ कभी पूरे दिल्ली क्षेत्र का हिस्सा थीं, लेकिन शहरीकरण (urbanization) और कटाई से अब बहुत कम बची हैं।
गुरुग्राम और सोहना गुरुग्राम (गुड़गाँव) का विकास अरावली की कटाई से ही हुआ है। सोहना में 90 के दशक से ही खनन शुरू हो गया था,
जिससे वहाँ के प्रसिद्ध हॉट वॉटर स्प्रिंग्स (सल्फर स्प्रिंग्स) सूखते गए। पहले लोग यहाँ त्वचा रोगों के इलाज के लिए जाते थे, लेकिन अब पानी का स्तर बहुत गिर गया है।
खनन और विनाश का प्रभाव!
अरावली भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला है (लगभग 2 अरब साल पुरानी) और यह थार रेगिस्तान से पूर्व की तरफ रेत और धूल को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार है।
खनन (विशेष रूप से हरियाणा और राजस्थान में) से पहाड़ियाँ कटती जा रही हैं, जिससे रेगिस्तान का विस्तार तेज हो रहा है।
दिल्ली-NCR में धूल-प्रदूषण बढ़ रहा है, गर्मी-ठंडी का पैटर्न बदल रहा है।
मौसम पर असर दिल्ली-राजस्थान का मौसम अब लगभग एक जैसा हो गया है।
अरावली न रहने से बारिश कम हो रही है, ग्राउंडवाटर चार्ज नहीं हो रहा, और उत्तर भारत का हरित पट्टी (हरियाणा, UP, बिहार तक) धीरे-धीरे सूखा और बंजर हो सकता है।
2025 में स्थिति हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में अरावली की नई डेफिनिशन अपनाई (100 मीटर से ऊँची पहाड़ियाँ ही अरावली मानी जाएँगी),
जिससे 90% से ज्यादा हिस्सा संरक्षण से बाहर हो सकता है। नई माइनिंग लीज पर रोक है, लेकिन पुरानी माइनिंग जारी रह सकती है।
पर्यावरणविद इसे “मौत का वारंट” कह रहे हैं, क्योंकि इससे रेगिस्तान पूर्व की ओर तेजी से बढ़ेगा।
डॉ. राजीव दीक्षित की उपमा बहुत सटीक है!
आपने “खाने के शौकीन” वाली बात कही—हाँ, विकास की हवस में अरावली को “खा” लिया जा रहा है, लेकिन शरीर (इकोसिस्टम) का बैलेंस बिगड़ रहा है।
अरावली को “अपेंडिक्स” की तरह नहीं समझना चाहिए; यह उत्तर भारत का फेफड़ा है। इसे बचाना हरियाणा, दिल्ली, UP, राजस्थान सबकी जरूरत है।
क्या हो रहा है बचाव के लिए?
केंद्र सरकार ने अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट शुरू किया है (2025 में तेज हुआ), जिसमें 5 किमी चौड़ी ग्रीन बेल्ट बनाई जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने सस्टेनेबल माइनिंग प्लान मांगा है, लेकिन पर्यावरणविद कह रहे हैं कि देर हो रही है।
अगर अरावली गई, तो दिल्ली की सर्दी-गर्मी, पानी की कमी, और प्रदूषण असहनीय हो जाएगा।
डॉ. राजीव दीक्षित की चिंता जायज है यह सिर्फ पहाड़ियों का मसला नहीं, पूरे उत्तर भारत की जिंदगी का है। #SaveAravalli जैसे अभियान चल रहे हैं, उम्मीद है जागरूकता बढ़ेगी।