“अगर मन में दर्द है तो उसे छिपाइए मत, किसी से कहिए… क्योंकि हर जिंदगी अनमोल है।”
विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस-2026 के अवसर पर एम्स ऋषिकेश में कुछ ऐसा ही भावुक और प्रेरणादायक माहौल देखने को मिला, जहां छात्रों,
शिक्षकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने मिलकर मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या रोकथाम को लेकर समाज में जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश में मनोरोग विभाग, सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन नर्सिंग एजुकेशन एंड रिसर्च (सीएनईआर) और टेली-मानस के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रमों ने यह संदेश दिया कि,
आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समय पर मिली मदद और संवाद जीवन को नई दिशा दे सकते हैं।
संस्थान की कार्यकारी निदेशक एवं सीईओ प्रो. (डॉ.) मीनू सिंह और डीन एकेडमिक्स प्रो. (डॉ.) सौरभ वार्ष्णेय के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रमों की शुरुआत ओपीडी परिसर में नर्सिंग छात्रों द्वारा प्रस्तुत एक मार्मिक नुक्कड़ नाटक से हुई।
जब मंच पर दिखा दर्द और उम्मीद का संघर्ष
नुक्कड़ नाटक में छात्रों ने शैक्षणिक दबाव, मानसिक तनाव, अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याओं को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया।
कलाकारों ने दिखाया कि कैसे कई युवा अपनी परेशानियों को भीतर ही भीतर दबा लेते हैं और अंततः गलत कदम उठाने की सोचने लगते हैं।
नाटक का सबसे भावुक संदेश था—”मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस है।”
इस प्रस्तुति ने उपस्थित लोगों को झकझोर दिया और यह सोचने पर मजबूर किया कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज में खुलकर बातचीत कितनी जरूरी है।
‘वॉल ऑफ होप’ बनी उम्मीदों की दीवार
कॉलेज ऑफ नर्सिंग में आयोजित ‘वॉल ऑफ होप’ (आशा की दीवार) कार्यक्रम में छात्रों ने रंग-बिरंगे संदेशों और प्रेरक नारों के माध्यम से जीवन के प्रति सकारात्मक सोच को व्यक्त किया।
किसी ने लिखा—”आप अकेले नहीं हैं”, तो किसी ने संदेश दिया—”हर अंधेरी रात के बाद नई सुबह आती है।”
इन संदेशों ने यह साबित किया कि थोड़ी-सी संवेदना और सहयोग किसी की जिंदगी बदल सकता है।
पत्थरों पर उकेरी जिंदगी की तस्वीर
‘स्टोन पेंटिंग’ गतिविधि में छात्रों और चिकित्सा समुदाय के सदस्यों ने पत्थरों पर रंगों और कलात्मक चित्रों के माध्यम से आशा, प्रेम, संघर्ष और जीवन की खूबसूरती को उकेरा।
रचनात्मक अभिव्यक्ति के इस माध्यम ने यह संदेश दिया कि मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कला और संवेदनाओं के जरिए भी की जा सकती है।
छात्रों और शिक्षकों ने मिलकर खोजे समाधान
कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रहा ‘छात्र-शिक्षक संवाद’, जिसका विषय था “आत्महत्या पर दृष्टिकोण बदलना”।
इस चर्चा में डीन एकेडमिक्स प्रो. सौरभ वार्ष्णेय, प्राचार्या प्रो. स्मृति अरोड़ा, प्रो. रवि गुप्ता,
डॉ. वंदना कुमार ढींगरा और मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. विशाल धीमान सहित कई वरिष्ठ विशेषज्ञ शामिल हुए।
वहीं छात्रों ने भी खुलकर अपने अनुभव और विचार साझा किए। चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि आत्महत्या को लेकर समाज में मौजूद चुप्पी,
और कलंक को खत्म करना होगा तथा सहानुभूति, संवाद और समय पर सहायता की संस्कृति विकसित करनी होगी।
छात्रों की मदद के लिए लॉन्च किया गया विशेष QR कोड
कार्यक्रम के दौरान छात्रों की मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए एक विशेष QR कोड भी लॉन्च किया गया।
एसोसिएट डीन छात्र कल्याण डॉ. वंदना कुमार ढींगरा ने बताया कि यह क्यूआर कोड एम्स ऋषिकेश की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध रहेगा,
जिसके माध्यम से छात्र आसानी से सहायता और परामर्श सेवाओं तक पहुंच सकेंगे।
एम्स का संदेश : ‘बोलिए, मदद मांगिए, उम्मीद मत छोड़िए’
एम्स ऋषिकेश ने इस अवसर पर मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता, आत्महत्या रोकथाम और सुलभ सहायता व्यवस्था को मजबूत बनाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
संस्थान ने छात्रों, स्वास्थ्यकर्मियों, मरीजों, परिवारों और समाज के सभी वर्गों से अपील की कि वे ऐसा वातावरण बनाने में सहयोग करें जहां कोई भी व्यक्ति अपनी परेशानी साझा करने से न डरे और जरूरत पड़ने पर मदद लेने में संकोच न करे।
पंचूर वार्ता संदेश
आत्महत्या किसी समस्या का अंत नहीं, बल्कि कई रिश्तों के लिए एक आजीवन पीड़ा की शुरुआत होती है।
यदि आपके आसपास कोई व्यक्ति मानसिक तनाव, अवसाद या निराशा से जूझ रहा है,
तो उसकी बात सुनिए, उसका साथ दीजिए और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सहायता लेने के लिए प्रेरित कीजिए।
एक संवेदनशील बातचीत किसी की जिंदगी बचा सकती है। ❤️
“उम्मीद हमेशा होती है… बस किसी का हाथ थामने की जरूरत होती है।”पंचूर वार्ता ब्यूरो