देहरादून के परेड ग्राउंड में एकत्रित होकर तिब्बती समाज के महिला पुरुष बच्चों ने मार्च निकाला।
जिसमें लोगों ने चीन तिब्बत को आजाद करने और पेंछन लामा को आजाद करने के नारे लगाए।
वही तिब्बत में औपनिवेशिक बोर्डिंग स्कूल बंद करने व विशाल बांधों के निर्माण को बंद करने की मांग की।
तिब्बतीय लोग दुनिया भर में तिब्बती राष्ट्रीय विद्रोह दिवस मना रहे हैं।
यह दिन 1959 में ल्हासा (तिब्बत की राजधानी) में चीन के खिलाफ हुए बड़े विद्रोह की 67वीं वर्षगांठ है,
जिसके बाद दलाई लामा और हजारों तिब्बती भारत में शरण लेने आए थे।
इस साल (2026) भी कई जगहों पर प्रदर्शन और कार्यक्रम हो रहे हैं:
भारत में दिल्ली में चीनी दूतावास के बाहर तिब्बती युवा कांग्रेस (Tibetan Youth Congress) के सदस्यों ने विरोध प्रदर्शन किया,
जहां पुलिस के साथ झड़प हुई और कई को हिरासत में लिया गया। धर्मशाला (दलाई लामा का मुख्यालय) में भी मार्च और प्रार्थना सभाएं हुईं।
अन्य देशों में ताइपे (ताइवान) में तिब्बती और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने चीन के दमन के खिलाफ मर्च किया।
कैनबरा (ऑस्ट्रेलिया), ब्रुसेल्स (बेल्जियम), स्विट्जरलैंड और अमेरिका में भी रैलियां, प्रार्थना और विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं।
लोग “Free Tibet”, “Tibet Not Xizang” जैसे नारे लगा रहे हैं और धार्मिक स्वतंत्रता, संस्कृति संरक्षण तथा दलाई लामा के पुनर्जन्म में चीन की दखलंदाजी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
यह दिन सिर्फ इतिहास याद करने का नहीं, बल्कि आज भी तिब्बत में जारी मानवाधिकार उल्लंघन, संस्कृति दमन और धार्मिक स्वतंत्रता की मांग का प्रतीक।