‘गुंडा’ शब्द हिंदी-उर्दू और सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं के प्रचलित शब्दों में से एक है,
जिसका सामान्य अर्थ असामाजिक, दुष्ट, झगड़ालू, उद्दंड, लुटेरा, गिरोहबाज, हिंसक या बदमाश व्यक्ति के रूप में लिया जाता है।
किंतु इसकी व्युत्पत्ति और अर्थ-विकास को लेकर कई तरह के विचार मौजूद हैं।
साथ ही, यह शब्द भारतीय भाषाओं और लोकप्रिय संस्कृति (पॉपुलर कल्चर) में भी गहराई से समाहित हो गया है।
मुख्य धारा के मीडिया माध्यमों पर गुंडा शब्द बार-बार सुनाई देता है। समकालीन समाज में गुंडा शब्द का प्रयोग अनेक रूपों में दिखाई देता है।
इस शब्द के व्यापक फैलाव की यात्रा महज एक शताब्दी पुरानी है।
वर्ष 1920 के अंग्रेजी अखबारों में goondah का प्रयोग दिखाई देता है।
इसकी स्पेलिंग देखकर लगता है कि इसका संबंध goon से है, लेकिन व्युत्पत्ति की दृष्टि से इसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता।
औपनिवेशिक काल में गुंडा शब्द का उपयोग अधिक स्पष्ट रूप से सामने आता है,
जब अंग्रेजों ने इसे goondah के रूप में अपनाया और इसे प्रशासनिक श्रेणी में शामिल किया।
तब इसे कानूनी और वैधानिक शब्द के रूप में स्वीकृति मिली।
ऐसे व्यक्तियों के लिए यह शब्द प्रयुक्त हुआ जो कानून-व्यवस्था के लिए खतरा माने जाते थे।
छोटे अपराधी गली-छाप गुंडे कहे जाते हैं। अवैध वसूली को गुंडा-टैक्स कहा जाता है।
यह भी सर्वविदित है कि कुछ प्रभावशाली लोग अपने स्वार्थों के लिए किराए के गुंडों का उपयोग करते हैं।
कई बार अभद्र ढंग से राजनेताओं को खादीवाला गुंडा और पुलिस को खाकीवाला गुंडा भी कह दिया जाता है।
कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए गुंडा-एक्ट जैसे प्रावधान दशकों से हैं, और एंटी-गुंडा स्क्वाड जैसी व्यवस्थाएं भी इसी का विस्तार हैं।
गुंडाशाही, गुंडागर्दी, गुंडई और गुंडाराज जैसे शब्द इसी से बने हैं।
साल 2023 में बहुचर्चित सजायाफ्ता गैंगस्टर और पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी ने बाराबंकी की अदालत में अर्जी देकर याचना की कि उसके लिए माफिया,
गुंडा और डॉन जैसे विशेषणों के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाए।
हिंदी बेल्ट में अपराधियों के लिए ‘गुंडा’ और ‘गैंगस्टर’ शब्द प्रचलित हैं।
‘गैंगस्टर’ से स्पष्ट है कि इसका संबंध किसी गैंग के सरगना यानी लीडर से है।
इनके विपरीत, दक्षिण भारतीय भाषाओं में गुंड या गुंडा का अर्थ हमेशा नकारात्मक नहीं होता।
मराठी में गांव-गुंड का अर्थ ग्राम-नायक या योद्धा के रूप में भी लिया गया है।
तमिल और अन्य भाषाओं में यह शब्द कभी-कभी शक्ति और नेतृत्व का परिचायक भी होता है।
द्रविड़ भाषाओं में गुंडराव और गुंडराज जैसे नाम इसके उदाहरण माने जा सकते हैं।
कुछ मतों के अनुसार यह शब्द कन्नड़ से जुड़ा माना जाता है।
मुंबई के बोरीवली क्षेत्र में गुंड शब्द से जुड़े भवन-नाम, जैसे गुंडेची, इस ओर संकेत करते हैं,
कि इस शब्द का प्रयोग अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न अर्थ-संकेतों के साथ मौजूद रहा है।
शब्दों की जीवन-यात्रा अक्सर अप्रत्याशित होती है। वे एक सांस्कृतिक संदर्भ से दूसरे में जाते हुए अपने अर्थ बदल लेते हैं।
कन्नड़ के मोक्षगुंडम जैसे शब्द में गुंड घटक का संबंध एक उदात्त अर्थ-संकेत से जोड़ा जा सकता है।
अंग्रेजी से इसकी उत्पत्ति मानने वाले इसे यूपी-बिहार से अधिक छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र से जोड़ते हैं।
हिंदी में ‘गुंडा’ शब्द का प्रचलन 20वीं सदी के पहले दशक में तब हुआ,
जब अंग्रेजों ने बस्तर के आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी गुंडाधुर धुरवा को ‘गुंडा’ कहना शुरू किया।
कहा जाता है कि अंग्रेजों के खिलाफ उनके बेखौफ विद्रोह और गिरफ्तारी से बच निकलने के कारण उन्हें इस रूप में प्रस्तुत किया गया।
और हां, गुंडा अकेला नहीं होता। उसके कुछ गुर्गे और मवाली भी होते हैं।
गुर्गे कई बार बदमाशी की सारी हदें पार कर जाते हैं। ऐसे में गुंडे के साथ एक और शब्द जुड़ता है,
‘मवाली’, जो हिंदी फिल्मों में भी खूब प्रचलित रहा।
यह शब्द अरबी के ‘वली’ से बना है, जिसके अर्थ संरक्षक, पथप्रदर्शक, स्वामी और मित्र हैं।
हालांकि, हिंदी शब्दकोशों में इसके अर्थ बदमाश, गुंडा, चोर-उचक्का, सरदार, मालिक, यार-दोस्त तक बताए गए हैं।
बताया जाता है कि सातवीं सदी में ‘वली’ से ‘मवाली’ शब्द तब बना, जब अरब में रहने वाले मिस्री,
हब्शी, ईरानी और तुर्की गुलामों ने किसी वली के संरक्षण में इस्लाम स्वीकार किया। आगे चलकर यही समुदाय ‘मवाली’ कहलाया गया।
इस्लाम स्वीकार करने के बावजूद इन लोगों का गैर-अरबीपन खत्म नहीं हुआ,
परिणामस्वरूप ‘मवाली’ शब्द का प्रयोग असभ्य और उजड्ड लोगों के लिए इस्तेमाल होने लगा।
यह स्पष्ट नहीं है कि यह शब्द भारत कैसे पहुंचा, लेकिन अब यह उन असभ्य, बदमाश, दुष्ट, लोगों के लिए इस्तेमाल होता है जो गुंडों के साथ होते हैं।
कुछ शब्दकोशों में ‘मवाली’ का अर्थ दक्षिण भारत की एक जाति भी बताया गया है।
कई बार लफंगे भी गुंडों के जोड़ीदार बन जाते हैं। हालांकि इनकी ज्यादा निकटता लुच्चों के साथ होती है।
(लुच्चे-लफंगे) इसे तुर्की अथवा फारसी मूल का माना जाता है। अब यह एक स्ट्रीट स्लैंग है,
जिसका अर्थ असभ्य व्यवहार करने वाला और अकारण लड़ाई-झगड़े पर उतारू व्यक्ति है।
शब्दकोशों में इसे नीच, दुश्चरित्र, व्यभिचारी लंपट, लोफर और शोहदा का पर्याय बताया गया है।
अर्थ-विकास की दृष्टि से गुंडा शब्द ने एक लंबी यात्रा तय की है। प्रारंभ में यह शब्द नकारात्मक नहीं था,
लेकिन बाद में पूरी तरह नकारात्मक अर्थ वाला शब्द बन गया, समय के साथ इसमें दबंग,
प्रभावशाली और कभी-कभी अन्याय के विरुद्ध खड़े होने वाले व्यक्ति का भाव भी जुड़ गया।
इसके बावजूद इसका मूल नकारात्मक अर्थ पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ।
हिंदी साहित्य में जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ ने इस शब्द को नया आयाम दिया।
यहां गुंडा केवल अपराधी नहीं, बल्कि एक साहसी, स्वाभिमानी और कहीं-कहीं जन-रक्षक के रूप में सामने आता है।
यहां गुंडा शब्द अलग स्तर की moral complexity पैदा करता है।
इस प्रकार साहित्य ने इस शब्द को आंशिक रूप से रोमांटिक और नायकत्वपूर्ण अर्थ भी प्रदान किया।
लोकप्रिय संस्कृति में यह शब्द और भी व्यापक रूप से स्थापित हुआ है। फिल्मों में गुंडा नाम वाली अनेक फिल्में एक प्रमुख उदाहरण हैं,
जिसमें गुंडा शब्द एंटी-हीरो की छवि के साथ उभरता है। गुंडाराज और गुंडागर्दी जैसी फिल्में अपराध और सत्ता के संबंधों को उजागर करती हैं।
लोकप्रिय लुगदी साहित्य में भी यह शब्द काफी प्रचलित रहा है। वेद प्रकाश शर्मा आदि लेखकों की रचनाओं में गुंडा जैसे शीर्षक मिलते हैं।
‘वर्दीवाला गुंडा’ तो भारत की सबसे अधिक बिकने वाली किताबों में से एक है।
फिल्मों और सस्ते साहित्य के अलावा टीवी, रंगमंच और व्यंग्य लेखन में यह शब्द एक स्थायी चरित्र-प्रकार बन चुका है,
जो कभी सत्ता के दुरुपयोग का प्रतीक होता है, तो कभी समाज के अनौपचारिक ताकतवर व्यक्ति का।
वस्तुतः गुंडा शब्द केवल एक नकारात्मक पद नहीं है, यह इतिहास, समाज,
साहित्य और जनसंस्कृति के प्रभाव से विकसित एक जटिल अवधारणा है, जिसकी व्याख्या संदर्भ के अनुसार बदलती रहीं।
अंत में, दो तीन और बातें – पहली, मीडिया माध्यमों में ‘गुंडा’ शब्द का अक्सर ही अतिशयोक्तिपूर्ण प्रयोग किया जाता है।
दूसरी, ‘गुंडा’ कई बार स्थानीय सत्ता-संरचना (लोकल पावर स्ट्रक्चर) का केंद्रीय तत्व भी होता है।
तीसरी, नए दौर में ‘गुंडा’ का स्वरूप बदल रहा है—अब साइबर ठग, ऑनलाइन ट्रोलर और साइबर बुली नए जमाने के गुंडे माने जा सकते हैं।
अंत में, ‘गुंडा’ पुलिंग शब्द है और इसका कोई प्रचलित स्त्रीलिंग रूप नहीं है।
हां, ‘गुंडी’ शब्द कभी-कभी सुनने में आता है, जिसका प्रयोग उत्तर प्रदेश की एक पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता के लिए उनके विपक्षियों द्वारा किया गया था, लेकिन यह चलन में नहीं है।
(यह लेख डॉ. राजेंद्र रंजन चतुर्वेदी की फेसबुक पर की गई संक्षिप्त टिप्पणी से प्रेरित है। कुछ तथ्य डॉ. सच्चिदानंद द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं।
इस विषय पर वर्ष 2023 में ‘द वायर’ ने भी एक लेख प्रकाशित किया है। लेखक, इसके मौलिक होने का दावा नहीं करता।)