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Assault:- हिंदुत्व की सबसे मजबूत आवाज़ों पर विदेशी मंच से हमला

देहरादून 27 मई 2026।

देश में अपनी संस्कृति, अपने धर्म और अपनी सभ्यता की बात क्या होने लग।

तो कुछ लोगों को इसकी जलन सात समंदर पार तक होने लगी।

अमेरिका की तथाकथित धार्मिक स्वतंत्रता आयोग(यूएससीआईआरएफ) की सुनवाई में भारत के तीन ऐसे मुख्यमंत्रियों को घेरने की कोशिश की गई,

जो लगातार हिंदू संस्कृति, सनातन परंपरा और राष्ट्रहित की बात खुलकर करते रहे हैं।

 यूएससीआईआरएफ की सुनवाई में एक वामपंथी-लिबरल एक्टिविस्ट रक़ीब अहमद नाइक द्वारा हिंदुत्व विचारधारा,

राष्ट्रवादी संगठनों और भारत की लोकतांत्रिक सरकारों के खिलाफ बयानबाज़ी करते हुए पुष्कर सिंह धामी,

योगी आदित्यनाथ और हिमंता बिस्वा सरमा पर “प्रतिबंध” लगाने की मांग तक कर दी गई।

इसके साथ ही आरएसएस, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों को भी निशाना बनाया गया।

अब सवाल उठ रहा है कि आखिर धर्म और संस्कृति की रक्षा की आवाज़ कुछ लोगों को इतनी क्यों चुभ रही है?

उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी ने समान नागरिक संहिता, अवैध कब्जों और धर्मांतरण जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाया।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने माफिया और कट्टरपंथ के खिलाफ कार्रवाई कर कानून का डर पैदा किया।

वहीं असम में हिमंता बिस्वा सरमा लगातार घुसपैठ और जनसंख्या असंतुलन जैसे मुद्दों को उठाते रहे हैं।

अब यही नेता विदेशी मंचों पर निशाने पर हैं। सवाल यह है कि आखिर क्यों?

क्या अपने ही देश में अपनी जमीन बचाने की बात करना गुनाह है?

क्या अपनी संस्कृति, अपने मंदिरों और अपनी पहचान की रक्षा की आवाज़ उठाना गलत है?

या फिर कुछ लोगों को दिक्कत सिर्फ इस बात से है कि अब हिंदू समाज खुलकर अपनी पहचान और अपने अधिकारों की बात करने लगा है?

विडंबना देखिए ,जो लोग भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का विश्वास नहीं जीत पाते,

वही विदेशी मंचों पर जाकर देश की छवि खराब करने में जुट जाते हैं। दुनिया के सामने ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की जाती है मानो यहां अपनी संस्कृति और धर्म की रक्षा करना कोई अपराध हो।

देश की जनता अब यह समझ रही है कि निशाना सिर्फ तीन मुख्यमंत्रियों पर नहीं है।

निशाना उस सोच पर है जो भारत को उसकी जड़ों, उसकी संस्कृति और उसकी सभ्यता से जोड़कर देखती है।

क्योंकि सच यही है  जिस दिन भारत अपनी संस्कृति और सनातन परंपरा की रक्षा के लिए एकजुट होकर खड़ा हो जाता है,

उसी दिन सबसे ज्यादा बेचैनी उन लोगों को होती है जिन्हें भारत की जड़ों से हमेशा परेशानी रही है।

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