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मूलभूत सिद्धांतिक भेद योग व ऐलोपैथी चिकित्सा विज्ञान में

देहरादून- सिम्प्टोमैटिक एवं सिस्टेमिक ट्रीटमेन्ट-आधुनिक चिकित्सा विज्ञान सिम्टम्स पर आधारित चिकित्सा प्रणाली का संवाहक है, वहीं योग एवं आयुर्वेद सिस्टम को संतुलित करके समस्त रोगों को निर्मूल करने का विज्ञान है। मलेरिया एवं टी बी. आदि बीमारियों को छोड़कर एलोपैथी में हाइपरटेंशन, डायबिटीज, अस्थमा व थायरॉयड आदि व्याधियों को मेन्टेन करने के लिए दवा दी जाती है। इन बीमारियों का परमानेन्ट क्योर एलोपैथी में नहीं है जबकि योग एवं प्राकृतिक जीवन शैली के द्वारा बी.पी, थायरॉयड व अस्थमा जैसी बीमारियाँ क्योर हो जाती है। प्राणायाम को यदि हम दो भागों में विभक्त करें, एक अनुलोम-विलोम के पहले व दूसरा अनुलोम-विलोम के बाद, तो भस्त्रिका, कपालभाति व बाह्य प्राणायाम की प्रक्रियाएँ जहां हमारे रिप्रोडक्टरी, एक्सक्रीटरी, डायजेस्टिव व स्केलिटल सिस्टम को समग्र रूप से संतुलित व स्वस्थ बनाती हैं, वहीं अनुलोम-विलोम, भ्रामरी, उद्‌गीथ व प्रणव प्राणायाम सर्क्युलेटरी, रेस्पिरेटरी, नर्वस व इन्डोक्राइन सिस्टम को पूर्णतः संतुलित कर हमें सम्पूर्ण आरोग्य देते हैं। बहुत से लोगों के मन में एक प्रश्न होता है कि एलोपैथी में प्रत्येक रोग की पृथक् दवा होती है जबकि योग में मुख्यतः आठ प्राणायाम एवं कुछ यौगिक क्रियाओं के अभ्यास से सब रोग एक साथ कैसे ठीक हो सकते हैं। वैसे भी एक सामान्य व्यक्ति के मन में इस शंका का उठना स्वाभाविक ही है कि जब रोग अलग-अलग तो योग सबके लिए एक जैस ही कैसे? इसके लिए प्रथम तो हमें शरीर विज्ञान एवं मनोविज्ञान को ठीक से समझना होगा और योग विज्ञान की प्रक्रियाओं के प्रभाव का भी हमें वैज्ञानिक विश्लेषण करना होगा।

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प्रथम बात तो हम सब के शरीर अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु शरीर एवं मन पृथक् पृथक् होते हुए भी हमारे शरीर की अन्तःप्रणाली, हमारी अन्तःखाई ग्रन्थियाँ, प्रजनन संस्थान, मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार या ब्रह्मरन्ध्र चक्र तक हम सब का भौतिक शरीर एवं मन, बुद्धि, चित्त एवं अहंकारादि से निर्मित हमारा भावनात्मक शरीर एक जैसा ही है। वात, पित्त एवं कफ के रूप में सबकी प्रकृति त्रिदोषात्मक है। सत्व, रज एवं तम के रूप में सब का मन त्रिगुणाल है। मनुष्य में बहुत सूक्ष्म अन्तर, मात्र डी.एन.ए. तथा संस्कारों के स्तर पर है। की डी.एन.ए. के स्तर पर अन्तर सब मनष्यों की अलग-अलग पहचान बनाने के लिए है तथा संस्कारों के स्तर पर अन्तर हमारे इस जन्म एवं पूर्वजन्मों के संचित कर्मा एवं ज्ञान के आधार पर है।

दोनों स्तरों पर यह अन्तर सबकी स्वतन्त्र पहचान मात्र के लिए है। चिकित्सा के क्षेत्र में यह अन्तर महत्वपूर्ण नहीं है। आधुनिक चिकित्सा में स्वस्थ व्यक्ति के लिए बनाये गये मानदंड, चाहे वे रक्त के स्तर पर परीक्षण हों या फिर हार्मोन्स, हृदय, यकृत्, वृक्क या मस्तिष्क से सम्बन्धित परीक्षण हों, सब की जांच की पद्धति एक जैसी होती है। जैसे कि सबका ब्लड प्रेशर, शुगर, कोलेस्ट्रॉल, आदि मापने या एन्जियोग्राफी, सी.टी. स्कैन, एम. आर. आई, अल्ट्रासाउण्ड, एक्सरे व एण्डोस्कोपी आदि करने का तरीका व उसके मापदण्ड सब कुछ एक जैसा ही होता है। सभी की  शुगर खाली पेट 100 से नीचे व सबका कोलेस्ट्रॉल 150 से कम ही होना चाहिए। सबके लीवर, किडनी, व हार्ट का आकार, भार व कार्यप्रणाली जब एक जैसी ही हो सकती है तो फिर एक जैसा योग होने में क्या बाधा है? एक जैसा योग सब मनुष्यों के एक जैसे सिस्टम को ठीक करने के लिए पर्याप्त है। वात, पित्त व कफादि दोषों को संतुलन में रखने के लिए है। जैसे कि आयुर्वेद में यद्यपि वात, पित्त व कफादि दोषों के लिए अलग-अलग औषधियाँ होती हैं, परन्तु गिलोयादि औषधियाँ त्रिदोषशामक होती हैं, वैसे ही योग-प्राणायाम त्रिदोषशामक है। तथा इसके साथ योग हमें सत्त्व, रज, तम आदि गुणों से पार गुणातीत अवस्था में ले जाता है।

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योग हमें मन से भी पार चेतना के द्वार पर ले जाता है। योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। योग इस जन्म व पूर्वजन्म के संचित संस्कारों से मुक्त कर हमें अपने स्वरूप का बोध कराता है। अतः योग सबके लिए एक जैसा होता है. क्योंकि हम सब पृथक् पृथक् होते हुए भी मूलतः एक जैसे ही हैं।

योग हमारे सिस्टम पर, मन पर, दोषों पर, व संस्कारों पर एक साथ एक जैसा प्रभाव डालकर प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक एवं भावनात्मक रूप से पूर्णरूपेण स्वस्थ कर देता है और अन्त में आत्मस्थ कर देता है, जबकि ऐलोपैथी की दवाएं सिम्टम पर काम करती हैं, जो सिम्टम पर आधारित होने से भिन्न-भिन्न होती हैं। यही मूलभूत भेद है योग व ऐलोपैथी में।

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ऐलोपैथी में दवा, कैमीकल साल्ट या हार्मोन्स आदि बाहर से रोगी व्यक्ति के शरीर में डालकर रोगी के भीतर इन कैमिकलादि का संतुलन करने की चेष्टा की जाती है। जबकि हम प्राणायामादि के अभ्यास के द्वारा कैमीकल साल्ट या हार्मोन्स आदि को भीतर से ही संतुलित रखते हुए अपने भीतर ही उन्हें उत्पन्न करते हैं। इस विज्ञान के बारे में समझने के बाद यह अज्ञान दूर हो जाता है। कि एक योग अनेक रोगी को एक साथ कैसे ठीक कर देता है। योग की तरह ही आयुर्वेद के सन्दर्भ में भी लगभग यही सिद्धान्त लागू होता है। योग की तरह आयुर्वेद की भी जड़ी-बूटियाँ एवं अन्य औषधीय प्रक्रियाएँ हमारे आठों सिस्टमों के ऊपर ही कार्य कर उनकी अन्त: प्रणाली को संतुलित करती है। उदाहरण के लिए शिलाजीत समस्त रोगों में काम करती है। ड

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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