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नियमित प्राणायाम करने से यह लाभ होते है

“कपालभाति प्राणायाम”

देहरादून – कपालभाति प्राणायाम में सामान्यरूपेण अन्तःश्वसन (सामान्य साँस लेना) तथा यत्नपूर्वक प्रश्वास अर्थात् प्रयासपूर्वक बहिःश्वसन (जबरन साँस छोड़ना) कराया जाता है। बलपूर्वक प्रश्वास की प्रकिया में महाप्राचीरा पेशी (डायफ़्राम) व औरिक (पेट) पेशियों में संकुचन व अकुंचन क्रिया होती है जिसक फलस्वरूप उदरस्थ विभिन्न अवयवों (जैसे कि आमाशय, अग्न्याशय (अग्न्याशय)

कपालभाति प्राणायाम 60 श्वसन (स्ट्रोक) प्रति मिनट।

यकृत्, प्लीहा, छोटी आँत, कोलन, गुर्दे, गर्भाशय इत्यादि) पर सुप्रभाव पड़ता है। उदर के ये सभी हिस्से उदर की संकुचन व प्रसारण क्रिया में इतने सशक्त व कार्यक्षम हो जाते हैं कि शरीर के लिए आवश्यक हर प्रकार के रस की आपूर्ति करने लगते हैं। अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से होने वाला स्राव न तो बहुत अधिक होता है न बहुत कम। इस प्रकार कपालभाति से महाप्राचीरा पेशी पर पुनः पुनः दबाब डालकर अपनी शरीररूपी मशीन को पूर्ण नीरोग रखने का महान् उपक्रम किया जाता है।

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इस उपर्युक्त क्रिया द्वारा शिरागत रक्तदाब (अंतःशिरा रक्तचाप) बढ़ जाता है तथा हृदय में रक्त बलपूर्वक वापस आता।

परिणामस्वरूप हृदय को अभूतपूर्व लाभ होता है। जो गति व स्पन्दन हमें प्राणायाम से मिलता है, वही आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में ईईसीपी क्रिया से सम्पादित किया जाता है। ई.ई.सी.पी. क्रिया के दौरान पैर के निचले इसमे (पिंडलियों) एवं श्रोणि प्रदेश (श्रोणि क्षेत्र) को  कफ़ द्वारा बांधा जाता है तथा प्रति मिनट लगभग 60 बार बाह्य आघात (बाहरी स्ट्रान) दिये जाते हैं। यह क्रिया आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में कोरोनरी एज्जियो प्लास्टी एवं बाईपास सर्जरी के विकल्प के रूप में मानी जाती है। ईई सौ.पी. की गति को हृदय स्पन्दन गति के समान किया जाता है जिससे धमनियों में स्पन्दन उत्पन्न होता है और उस स्पन्दन से धमनियों में उपस्थित अवरोध दूर हो जाते हैं। इसी प्रक्रिया को हम प्राणायाम से भी प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि प्राणायाम से भी हम स्पन्दन उत्पन्न करते हैं जो रक्त नलिकाओं से अवरोध दूर करने में मदद करते हैं तथा नियमित प्राणायाम करने से वे अवरोध आगे पुनः उत्पन्न नहीं होते।

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उपर्युक्त तथ्य को हम एक अन्य उदाहरण से समझाना चाहेंगे। जब कोई सेना की टुकड़ी मार्च पास्ट करती हुई किसी पुल के ऊपर से गुजरती है तो कदम ताल तोड़कर चलने की हिदायत दी जाती है। ताकि पुल की प्राकृतिक फ्रीक्वेन्सी और कदम ताल की फोर्ल्ड फ्रीक्वेन्सी के सामंजस्य से जो रेजोनैन्स (शक्ति) उत्पन्न होती है वह शक्ति उस पुल को तोड़ ना डाले। इसी रेजोनैन्स के सिद्धांत का लाभ प्राणायाम की फोर्ड फ्रीक्वेन्सी व हृदय तथा धमनियों की प्राकृतिक फ्रीक्वेन्सी के मिलने से उत्पन्न होने वाले रेजोनैन्स के द्वारा भी हमें प्राप्त होता है जिससे धमनियों में जमे हुए खून के थक्के पिघलकर खून में बह जाते हैं। फलतः धमनियों का अवरोध दूर हो जाता है।

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एक अन्य उदाहरण। जब बस गतिशील नहीं होती अर्थात् खड़ी हुई होती है पर इंजन चल रहा होता है तो बस की प्राकृतिक फ्रीक्वेन्सी और इंजन की फोस्डं फ्रीक्वेन्सी के लयबद्ध होने पर यदा-कदा पूरी बस एकदम काँप उठती है। उस कम्पन को बस में बैठे यात्री सहज ही अनुभव करते हैं। जिस तरह बस में यात्री बैठे होते हैं ठीक उसी तरह यदि धमनियों में यत्र-तत्र खून के धक्के जमे हुए हों तो प्राणायाम से उत्पन्न रेजोनैन्स से वे धक्के पिघलकर खून में बहने के लिये मजबूर हो जाते हैं। परिणामस्वरूप धमनियों का अवरोध हट जाता है और बाइपास ऑप्रेशन इत्यादि की आवश्यकता नहीं पड़ती।

 

 

 

 

 

 

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