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Black Harela:- हरेला की पूर्व संध्या पर देहरादून में मनाया गया ‘काला हरेला’ 

 देहरादून 16 जुलाई 2026।

 उत्तराखंड के लोक पर्व और हरियाली के उत्सव ‘हरेला’ की पूर्व संध्या पर  देहरादून का ऐतिहासिक परेड ग्राउंड गहरे आक्रोश और शोक का गवाह बना।

जहां एक ओर प्रदेश में हरेला पर्व पर लाखों पौधे लगाने की तैयारियां चल रही हैं,

वहीं दूसरी ओर ऋषिकेश-भानियावाला हाईवे को सिक्स-लेन (6-lane) बनाने के नाम पर करीब 5,500 पेड़ों को बेरहमी से बर्बाद किए जाने के विरोध में,

विभिन्न सामाजिक और पर्यावरण संगठनों ने आज के दिन को ‘काला दिवस’ और ‘काला हरेला’ (Black Harela) के रूप में मनाया।

विगत कई वर्षों से हरेला पर्व को जन-जन तक पहुँचाने वाली प्रमुख संस्था ‘धाद’ ने इस वर्ष विरोध स्वरूप 16 जुलाई के बजाए 15 जुलाई को ही ‘काला हरेला’ मनाते हुए।

इस अंधाधुंध कटान पर अपनी गहरी चिंता और दुख व्यक्त किया। आंदोलनकारियों ने कहा कि मानसून के इस पावन सीजन में,

जब हर हाथ को पेड़ लगाने के लिए आगे आना चाहिए था, उस समय ऋषिकेश-भानियावाला हाईवे पर 4,500 से अधिक पेड़ों को निर्ममता से काटा जा रहा है।

इसके अलावा जिन 700 पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने का दावा किया जा रहा है,

पर्यावरणविदों ने उसे पूरी तरह खोखला बताते हुए उन पेड़ों की भी ‘निश्चित मृत्यु’ करार दिया है।

उत्तराखंड महिला मंच की कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी और अनदेखी पर तीखा रोष,

प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने 14 जुलाई को ऋषिकेश-भानियावाला हाईवे से शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रही।

उत्तराखंड महिला मंच की पांच महिला कार्यकर्ताओं की पुलिस द्वारा की गई गिरफ़्तारी पर गहरा रोष व्यक्त किया।

वक्ताओं ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “उत्तराखंड महिला मंच राज्य गठन के आंदोलन से लेकर आज तक,

प्रदेश के विभिन्न सामाजिक सरोकारों और आंदोलनों में हमेशा सक्रिय और अग्रणी रहा है।

बेहद दुखद है कि इतने पुराने व प्रतिष्ठित संगठन और सिविल सोसाइटी (नागरिक समाज) से किसी भी नीति,

या योजना पर कोई राय-मशवरा करना सरकार उचित नहीं समझती।

बिना किसी जन-संवाद के अंधाधुंध विनाशकारी योजनाएं जनता पर थोपी जा रही हैं।

और आवाज उठाने पर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध कर रही महिलाओं का दमन किया जा रहा है।”

मात्र 10 मिनट बचाने के लिए पर्यावरण का इतना बड़ा विनाश क्यों ?

सभा को संबोधित करते हुए कई वक्ताओं ने बेहद तीखा सवाल उठाया कि,

आखिर सफर के मात्र 10 मिनट बचाने के लिए इस खूबसूरत और संवेदनशील एलीफेंट कॉरिडोर को क्यों बर्बाद किया जा रहा है?

क्या 10 मिनट की बचत हमारे पर्यावरण, वन्यजीवों और उत्तराखंड की इस अनमोल धरोहर से ज्यादा कीमती है?

इस कॉरिडोर के नष्ट होने से न केवल हाथियों का प्राकृतिक आवास छिड़ेगा,

बल्कि भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की ऐसी भयावह स्थिति पैदा होगी जिसे संभालना प्रशासन के बस से बाहर हो जाएगा।

‘जल, जंगल, जमीन’ की दुश्मन ताकतों को जनता सिखाएगी सबक,

आक्रोशित वक्ताओं ने इसे सीधे तौर पर चुनावी राजनीति से जोड़ते हुए चेतावनी दी कि,

जो भी सरकार उत्तराखंड के ‘जल, जंगल और जमीन’ की दुश्मन बनेगी और अंधी-बहरी होकर काम करेगी,

उसे यहां का आम मानस आने वाले समय में अपने वोट की चोट से करारा जवाब देगा।

अब उत्तराखंड की जनता मूकदर्शक बनकर अपने जंगलों को लुटते हुए नहीं देखेगी।

प्रदर्शनकारियों ने एक सुर में साफ किया कि यदि इस अंधाधुंध पर्यावरण विनाश, जबरन थोपी जा रही नीतियों और दमनकारी कार्रवाइयों को तुरंत नहीं रोका गया,

तो यह आंदोलन केवल परेड ग्राउंड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे उत्तराखंड के गांव-गांव और कस्बे-कस्बे में फैलकर एक बड़े जन-विद्रोह का रूप ले लेगा।

वक्ताओं मैं, हरीओम पाली, निर्मला बिष्ट, अनूप नौटियाल, इरा चौहान, हिमांशु अरोड़ा, राजदीप, एवं अन्य रहे।

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