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DehradunNews:- शरीर में जीवात्मा यहां रहती है

देहरादून – सहस्त्रार चक्र तालु के ऊपर मस्तिष्क में ब्रह्मरन्ध्र से ऊपर सब दिव्य शक्तियों का केन्द्र है। इस चक्र पर प्राण तथा मन के निग्रह से प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा एवं स्मृति-रूप वृत्तियों का निरोध होने पर असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति हो जाती है।

पिच्युटरी (पीयूष ग्रन्थि) एवं पीनियल सहित सम्पूर्ण अन्तःस्रावी ग्रन्थियों का सम्बन्ध सहस्त्रार चक्र से है। सहस्त्रार चक्र के जागृत होने पर इसका कार्य (इन्डोक्राइन सिस्टम) संतुलित हो जाता है।

विद्वान् योगाभ्यासी साधकों का मानना है कि उपनिषदों में जो अंगुष्ठमात्र हृदय-पुरुष का वर्णन है, वह यह ब्रह्मरन्ध्र ही है, जिसके ऊपर सहस्त्रार-चक्र है (क्योंकि यही अंगुष्ठ-मात्र आकारवाला है)। यहीं चित्त का स्थान है, जिसमें आत्मा के ज्ञान का प्रकाश या प्रतिबिम्ब पड़ रहा है।

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शरीर में जीवात्मा कहाँ रहता है? यह एक जटिल प्रश्न है कि आत्मा के ज्ञान का प्रकाश चित्त पर पड़ता है। चित्त ही मानो सूक्ष्म शरीर है। इस सूक्ष्म-शरीर के साथ सम्बद्ध होने पर ही आत्मा की संज्ञा जीवात्मा होती है।

सूक्ष्म-शरीर स्यूत-शरीर में व्याप्त है। इस प्रकार जीवात्मा पूरे देह में व्यापक है। फिर भी कार्यभेद से उसके कई स्थान बतलाये जा सकते हैं।सामान्यतया सुषुप्ति अवस्था में जीवात्मा हृदय-देश में रहता है क्योंकि इदय शरीर का मुख्य केन्द्र हैं।

यहीं से सम्पूर्ण शरीर में नाडियाँ जा रही हैं। हरीर के आन्तरिक कार्य यहीं बन्द हो जाते हैं। इसलिए सुषुप्ति अवस्था में संवात्मा का स्थान हृदय कहा जा सकता है। जैसा कि उपनिषद् में भी कहा है।

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“यत्रैच एतत् सुप्तोऽभूत् य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणाना विज्ञानेन विज्ञानमादाय य एषोऽन्तहृदय आकाशस्तम्मिओते”

 

 

 

जब यह पुरुष (आत्मा), जो कि विज्ञानमय है, गहरा सोया हुआ है, तब वह इन इन्द्रियों के विज्ञान के द्वारा, विज्ञान को लेकर जो यह इदव के अन्दर आकाश है. वहाँ आराम करता है।

स्वप्नावस्था में जीव का स्थान कण्ठ बतलाया गया है क्योंकि जागृ में जो पदार्थ देखे. सुने या भोगे जाते हैं, उनके संस्कार का आकार बाल के हजारवें हिस्से जितना है। इसलिए अनुभूत पदार्थों का संस्कार-रूप में सूक्ष्म स्वप्न-अवस्था में कण्ठ में होता है।

जागृत अवस्था में जीवात्मा बाह्य इन्दि के द्वारा बाहर के विषयों को देखता है। बाह्य इन्द्रियों में नेत्र प्रधान है, इसि जागृत अवस्था में जीवात्मा की स्थिति नेत्र में बतलाई गई है।

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य एषोऽक्षिणि पुरुषो वृश्यत एष आत्मेति।

यह जो आँख में पुरुष दिखाई देता है, वह आत्मा है। सम्प्रज्ञात समाधि में जीवात्मा का स्थान आज्ञा चक्र कहा जा सकता है क्योंकि यही दिव्य दृष्टि का स्थान है)। इसी को दिव्यनेत्र या शिवनेत्र भी कहते हैं।

असम्प्रजात समाधि में जीवा का स्थान ब्रह्मरन्ध्र है, इसी स्थान पर प्राण तथा मन के स्थिर हो जाने पर अम्लतसम्म अर्थात् सर्ववृत्तिनिरोध होता है। पुस्तक के प्रारम्भ में (1) सुषुम्णा-शीर्ष है. (2) लघु-मस्तिष्क (3) पंचतन्मात्र से घिरा, मन-बुद्धि-पत इन्द्रियों का सम्पुट ‘विज्ञानमय कोश’ या ‘सूक्ष्म शरीर’ है। (4) (सहस्त्रार), (5) अन्तर्मस्तिष्क का भाग है. यहाँ लाल ३ चिड़ ‘अधिपति एवं कहलाता है।

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