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Protests :- स्थायी राजधानी गैरसैंण समिति के आंदोलनकारियों ने भैंस के आगे बीन बजाकर विरोध प्रदर्शन किया

देहरादून 16 जून 2026।

उत्तराखंड की अस्मिता और जनभावनाओं के केंद्र ‘गैरसैंण’ को स्थायी राजधानी घोषित कराने की मांग को लेकर,

‘स्थायी राजधानी गैरसैंण समिति’ के बैनर तले चल रहा,आंदोलन एक अत्यंत उग्र पड़ाव पर पहुंच गया है।

क्रमिक अनशन के आज सफलता पूर्वक सौ दिन पूरे होने पर आंदोलनकारियों का गुस्सा फूट पड़ा।

इस निर्णायक अवसर पर आंदोलनकारियों ने सुबह सबसे पहले देश और प्रदेश के शीर्ष राजनेताओं की सोई हुई आत्मा और सद्बुद्धि को जगाने के लिए,

तथा गैरसैंण को अविलंब स्थायी राजधानी बनाने की मांग के साथ यज्ञ-हवन में आहुतियां दीं।

इसके तत्काल बाद, सत्ता के नशे में चूर शासन-प्रशासन की बहरी कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए।

आंदोलनकारियों ने भैंस के आगे बीन बजाकर विरोध प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारियों ने सीधे शब्दों में गर्जना करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार पूरी तरह से भैंस बन चुकी है, जिसे पहाड़ की जनता के आंसुओं,

उनके संघर्ष और इस सौ दिनों के अनशन से कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।

इसी आक्रोश के बीच प्रदर्शन स्थल पर सत्ताधीशों के दोहरे चरित्र को बेनकाब करता हुआ एक बेहद धारदार राजनीतिक नाटक खेला गया।

आंदोलनकारियों ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज,

विधायक विनोद चमोली और दिलीप रावत के मुखौटे पहनकर व्यवस्था पर करारा तंज कसा और उनके अहंकार को दिखाते हुए कहा कि,

‘हम पहाड़ों की भावनाओं को कुचल देंगे लेकिन गैरसैंण को राजधानी नहीं बनाएंगे।

इसी बीच समिति के लोगों ने इन जनविरोधी नेताओं और विधायकों के ढोंग की बखिया उधेड़ते हुए सीधे हुंकार भरी।

इन स्वार्थी नेताओं पर करारा प्रहार करते हुए जनता के सामने उनकी असलियत रखी और कहा कि ये नेता अंदर से कहते हैं।

कि हमें पहाड़ों में ठंड लगती है, हमें ऑक्सीजन की कमी महसूस होती है, हम तो मंचों से सिर्फ ‘जय पहाड़ी’ का खोखला नारा लगाते हैं।

और खुद मजे से दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में ऐश की जिंदगी जीते हैं। अत्यंत तल्ख लहजे में नेताओं को आईना दिखाते हुए कहा कि आज भले ही यह मुखौटा प्रतीकात्मक है,

लेकिन उत्तराखंड का बच्चा-बच्चा जानता है कि राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी गैरसैंण को उसका अधिकार न मिलने के असली दोषी और गुनहगार यही राजनेता और इनके भाई-बंधु हैं, जिन्होंने पहाड़ को सिर्फ लूटा है।

इस भयंकर और ऐतिहासिक प्रदर्शन में क्रमिक अनशन पर डटे गोपाल दत्त कुमेडी के अटूट हौसले को सलाम करने और इस आर-पार की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के लिए पूरा क्षेत्र उमड़ पड़ा।

आंदोलन की इस महा-हुंकार में पूर्व आईएएस विनोद प्रसाद रतूड़ी, गोपाल दत्त कुमेडी, ब्रिगेडियर सर्वेश डंगवाल, पार्थ रतूड़ी,

मनमोहन शर्मा, सचिन थपलियाल, शैलेंद्र शेखर करगेती, कुलदीप अग्रवाल, रामेश्वर शर्मा, दौलत राम शाह,

सत्य प्रकाश कोठियाल सहित भारी संख्या में मातृशक्ति और वरिष्ठ आंदोलनकारियों ने एक सुर में प्रतिज्ञा ली कि,

जब तक गैरसैंण को स्थायी राजधानी का आधिकारिक दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक यह क्रांति थमेगी नहीं और सरकार के इस दमनकारी रवैये का ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाएगा।

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