डिजिटल युग में मनोरंजन का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कभी परिवार के साथ बैठकर देखी जाने वाली फिल्में और धारावाहिक जमाना बदल सा गया है।
आज मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन पर कुछ भी किसी भी समय उपलब्ध हैं।
आज ओटीटी प्लेटफॉर्म ने दर्शकों को विकल्पों की भरमार दी है, लेकिन इसी के साथ एक गंभीर चिंता भी सामने आई है।
भाषाई मर्यादा का लगातार ह्रास और अश्लीलता तथा अभद्रता का बढ़ता प्रदर्शन।
आज अनेक वेब सीरीज़ और फिल्मों में गाली-गलौज, अश्लील संवाद, अंतरंग दृश्यों और हिंसा को “यथार्थवाद” या “रचनात्मक स्वतंत्रता” के नाम पर परोसा जा रहा है।
सवाल यह नहीं है कि कला को स्वतंत्रता मिलनी चाहिए या नहीं; सवाल यह है कि क्या स्वतंत्रता का अर्थ सामाजिक जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त हो जाना है ?
भारत जैसे देश में परिवार केवल एक सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि संस्कारों की पहली पाठशाला है।
जब बच्चे और किशोर बिना पर्याप्त निगरानी के डिजिटल सामग्री देखते हैं, तब वे केवल कहानी नहीं देखते,
बल्कि भाषा, व्यवहार और जीवनशैली भी सीखते हैं। यदि मनोरंजन का बड़ा हिस्सा अभद्र भाषा,
महिलाओं के प्रति असम्मानजनक व्यवहार या अनावश्यक अश्लीलता को सामान्य रूप में प्रस्तुत करेगा,
तो उसका प्रभाव युवाओं की सोच और व्यवहार पर पड़ना स्वाभाविक है।
हाल के समय में सार्वजनिक आयोजनों और प्रदर्शनों के दौरान भी ऐसी भाषा और व्यवहार देखने को मिले हैं,
जिन्हें कभी सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जाता था। यह कहना उचित नहीं होगा कि इसका कारण केवल ओटीटी या फिल्में हैं,
क्योंकि सामाजिक व्यवहार अनेक कारकों—परिवार, शिक्षा, मित्र मंडली, सोशल मीडिया और व्यापक सामाजिक वातावरण—से प्रभावित होता है।
फिर भी यह भी सच है कि मनोरंजन माध्यम समाज की सोच और भाषा पर गहरा प्रभाव डालते हैं और इस जिम्मेदारी से वे स्वयं को अलग नहीं कर सकते।
यह भी स्वीकार करना होगा कि ओटीटी प्लेटफॉर्म ने कई उत्कृष्ट, विचारोत्तेजक और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाएँ भी दी हैं।
इसलिए पूरे माध्यम को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। समस्या उन निर्माताओं से है जो लोकप्रियता और व्यावसायिक लाभ के लिए अश्लीलता और अभद्र भाषा को आसान हथियार बना लेते हैं।
समाधान केवल सरकारी प्रतिबंध नहीं हो सकता। आवश्यकता प्रभावी आयु-आधारित वर्गीकरण, स्पष्ट कंटेंट चेतावनी,
अभिभावकों के लिए मजबूत पैरेंटल कंट्रोल, जिम्मेदार स्व-नियमन और मीडिया साक्षरता की है।
माता-पिता को भी बच्चों के डिजिटल जीवन में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। स्कूलों और समाज को भी यह सिखाना होगा कि स्क्रीन पर दिखाई जाने वाली हर चीज़ अनुकरण योग्य नहीं होती।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन हर अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है।
मनोरंजन का उद्देश्य केवल चौंकाना नहीं, बल्कि समाज को समृद्ध करना भी होना चाहिए। यदि लोकप्रियता की दौड़ में भाषा की गरिमा,
सामाजिक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक मर्यादा पीछे छूट जाए, तो यह केवल मनोरंजन उद्योग की नहीं, पूरे समाज की चिंता का विषय बन जाता है।
आज समय की मांग है कि मनोरंजन उद्योग, सरकार, अभिभावक और समाज मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करें,
जहाँ रचनात्मक स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियों के संस्कार, भाषा और सामाजिक मर्यादा भी।