उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस के भीतर एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ नेता हरीश रावत की सक्रियता चर्चा के केंद्र में है।
हरीश रावत की ओर से निकाली जा रही ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को लेकर पार्टी के भीतर उठ रहे सवालों के बीच उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है।
रावत ने कहा कि उनकी यात्रा को दिल्ली में गलत समझा जा रहा है, जबकि इसका उद्देश्य कांग्रेस कार्यकर्ताओं और आम जनता से संवाद करना तथा कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना है।
हरीश रावत ने फेसबुक पोस्ट में कहा कि दिनभर चली यात्रा में हजारों कांग्रेसजन शामिल हुए।
दूर-दराज के गांवों से बुजुर्ग लोग भी उनसे मिलने पहुंचे, जिनमें कई ऐसे लोग थे जो अब सक्रिय राजनीति और सामाजिक जीवन से दूर हैं।
उन्होंने कहा कि यात्रा से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल काफी बढ़ा है।
‘कांग्रेस का हर महत्वपूर्ण चेहरा किसी न किसी रूप में यात्रा में शामिल हुआ’
रावत ने अपने पोस्ट में दावा किया कि कांग्रेस के लगभग सभी महत्वपूर्ण लोग इस यात्रा में किसी न किसी रूप में शामिल हुए हैं।
उन्होंने कहा कि दो-चार सहयोगियों की अपनी बाध्यताएं रही होंगी, इसलिए वे शामिल नहीं हो पाए, लेकिन बाकी लोग यात्रा में मौजूद रहे।
यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से नेतृत्व,
संगठन और आगामी चुनावी रणनीति को लेकर अलग-अलग स्तर पर राजनीतिक गतिविधियां दिखाई देती रही हैं।
रावत की जनसंवाद यात्रा को इसी व्यापक राजनीतिक पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है।
दिल्ली में यात्रा को लेकर गलतफहमी पर रावत ने दी सफाई
हरीश रावत ने कहा कि उन्हें अभी जानकारी मिली कि दिल्ली में उनकी ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ को फिर से गलत समझा जा रहा है।
उन्होंने बताया कि एक दिन पहले उन्होंने कांग्रेस संगठन के वरिष्ठ नेता से मुलाकात की थी और यात्रा से जुड़ी पूरी स्थिति उन्हें समझाई थी।
रावत के मुताबिक, यदि पार्टी की ओर से कोई को-ऑर्डिनेटेड कार्यक्रम तैयार किया जा रहा है,
तो उन्होंने अपनी आगे की प्रस्तावित 8-10 यात्राओं को स्थगित करने की बात कही है।
हालांकि, उन्होंने कहा कि वर्तमान यात्रा पहले से निर्धारित थी और इस समय इसे स्थगित करने से सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मनोबल पर प्रतिकूल असर पड़ता।
उन्होंने कहा कि इसी वजह से उन्होंने आज की यात्रा को लेकर माफी भी मांगी और स्पष्ट किया कि यह कार्यक्रम पहले से तय था।
7 अक्टूबर को शैलजा से मुलाकात, स्पष्टीकरण देने को तैयार
रावत ने कहा कि संभव है कि वह अपनी बात पार्टी नेतृत्व के सामने ठीक से नहीं रख पाए हों।
उन्होंने बताया कि कांग्रेस की वरिष्ठ नेता ने उन्हें मुलाकात का समय दिया है और 7 अक्टूबर को शाम 7 बजे उनकी मुलाकात प्रस्तावित है।
रावत ने साफ कहा कि पार्टी को उनसे स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार है और वह अपना पक्ष रखने के लिए तैयार हैं।
‘कांग्रेस का कोई संगठित जनसंपर्क अभियान दिखाई नहीं दे रहा’
हरीश रावत ने हालांकि इसके साथ ही पार्टी संगठन की सक्रियता को लेकर भी सवाल खड़ा कर दिया।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कांग्रेस का कोई बड़ा संगठित कार्यक्रम नहीं चल रहा है।
कहीं-कहीं प्रदर्शन हो रहे हैं और वह स्वयं भी उन प्रदर्शनों में हिस्सा लेते हैं, लेकिन जिलों, ब्लॉकों, सड़कों और ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से कोई व्यापक एवं संगठित जनसंपर्क अभियान दिखाई नहीं दे रहा है।
रावत का सवाल सीधे तौर पर पार्टी संगठन की कार्यप्रणाली पर निशाना माना जा रहा है।
उन्होंने पूछा कि जब कांग्रेस की ओर से व्यापक जनसंपर्क अभियान नहीं चलाया जा रहा है,
तो उनकी ‘धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा’ से कांग्रेस के कार्यक्रमों में कमजोरी आखिर कहां आ रही है?
यात्रा बनी शक्ति प्रदर्शन या संगठनात्मक सक्रियता का माध्यम?
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो रावत की यात्रा को केवल धन्यवाद यात्रा मानना आसान नहीं है।
जिस तरह इसमें कांग्रेस के कार्यकर्ताओं, ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की भागीदारी दिखाई दे रही है,
उससे यह यात्रा जनसंपर्क के साथ-साथ राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का रूप भी लेती नजर आ रही है।
रावत का अपना राजनीतिक जनाधार और प्रदेशभर में संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क इस यात्रा को अलग महत्व देता है।
ऐसे में पार्टी नेतृत्व यदि संगठन के स्तर पर कोई समन्वित कार्यक्रम तैयार कर रहा है,
तो रावत की स्वतंत्र जनसंवाद यात्रा और पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रमों के बीच तालमेल का सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहा है।
आगामी चुनावी राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा घटनाक्रम
उत्तराखंड की राजनीति में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सभी दल धीरे-धीरे अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
ऐसे समय में किसी वरिष्ठ नेता की लगातार क्षेत्रीय यात्राएं राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
हरीश रावत का यह बयान भी संकेत देता है कि वह अपनी राजनीतिक सक्रियता को बनाए रखना चाहते हैं,
लेकिन साथ ही पार्टी नेतृत्व के साथ टकराव की स्थिति से बचने का रास्ता भी खुला रखना चाहते हैं।
यही कारण है कि उन्होंने एक ओर पार्टी को स्पष्टीकरण देने की बात कही है, वहीं दूसरी ओर अपनी यात्रा के औचित्य का मजबूती से बचाव किया है।
अब निगाहें 7 अक्टूबर की हरीश रावत और कुमारी शैलजा की प्रस्तावित मुलाकात पर टिकी हैं।
इस बैठक में यात्रा को लेकर पार्टी की आपत्तियों और रावत के पक्ष के बीच कितना समन्वय बनता है,
यह आने वाले दिनों में उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीतिक दिशा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।