बदरीनाथ में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर उठे विवाद के बीच पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपनी फेसबुक वॉल के माध्यम से पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज के बयान पर सवाल उठाए हैं।
रावत ने कहा है कि बदरीनाथ, माणा और गुप्तकाशी से ऊपर का हिमालयी क्षेत्र आध्यात्म और साधना की भूमि है,
इसलिए इन क्षेत्रों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक गरिमा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
बदरीनाथ की आध्यात्मिक गरिमा पर हरीश रावत के सवाल, बोले—‘भूमि तो खो दी या खो रहे हो, संस्कृति तो बचा लो’
बदरीनाथ धाम के समीप आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम को लेकर चल रहे विवाद के बीच पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज के बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दी है।
रावत ने सोशल मीडिया पर जारी अपनी टिप्पणी में कहा कि जोशीमठ से ऊपर तथा गुप्तकाशी से ऊपर का क्षेत्र सामान्य पर्यटन नहीं,
बल्कि आध्यात्म और साधना की भूमि है। ऐसे क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक मर्यादा है, जिसे बनाए रखना जरूरी है।
रावत ने अपनी पोस्ट की शुरुआत करते हुए कहा, “भूमि तो खो दी या खो रहे हो, संस्कृति तो बचा लो।”
उन्होंने कहा कि सतपाल महाराज का बयान उन्हें अटपटा लगा।
उनके अनुसार बदरीनाथ और उसके आसपास के उच्च हिमालयी क्षेत्र ऐसे स्थान हैं जहां लोग भगवान के चरणों में स्वयं को समर्पित करने, ध्यान लगाने और आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने पहुंचते हैं।
‘हर जगह मनोरंजन आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम जरूरी नहीं’
हरीश रावत ने कहा कि इन क्षेत्रों को सामान्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों या मनोरंजन आधारित पर्यटन के केंद्र के रूप में विकसित करने के बजाय आध्यात्म आधारित सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब कोई व्यक्ति बदरीनाथ जैसे तीर्थस्थल पर आध्यात्मिक उद्देश्य से पहुंचता है तो उसका ध्यान भगवान के चरणों में होना चाहिए।
ऐसे में वहां मनोरंजन प्रधान कार्यक्रमों के बजाय धार्मिक भावनाओं और स्थानीय आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े आयोजन अधिक उपयुक्त होंगे।
रावत ने कहा कि ढोल-दमाऊं, छलिया और अन्य लोकनृत्यों की अपनी महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पहचान है,
लेकिन बदरीनाथ जैसे तीर्थस्थल पर यदि नृत्य हो तो वह भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और उनकी आराधना से जुड़ी परंपराओं पर आधारित होना चाहिए।
‘सांस्कृतिक कार्यक्रम हों तो भगवान को समर्पित हों’
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि बदरीनाथ क्षेत्र में सांस्कृतिक टोलियों को आमंत्रित किया जाता है तो उनकी प्रस्तुतियां भगवान विष्णु, कुबेर और लक्ष्मी को समर्पित होनी चाहिए।
उन्होंने क्षेत्र की धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक परंपराओं और स्थानीय आध्यात्मिक विरासत को कार्यक्रमों का आधार बनाने की बात कही।
उन्होंने बदरीनाथ क्षेत्र की पर्वत श्रृंखलाओं और उनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इन आयोजनों की विषयवस्तु भी इसी आध्यात्मिक विरासत से जुड़ी होनी चाहिए।
‘माणा को प्लेजर टूरिज्म का केंद्र न बनाएं’
हरीश रावत ने विशेष रूप से माणा को लेकर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि यदि माणा को प्लेजर टूरिज्म के लिए खोलकर बड़े पैमाने पर मनोरंजन आधारित पर्यटन को बढ़ावा दिया गया तो,
देश-दुनिया की बड़ी पर्यटन कंपनियां वहां निवेश और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए पहुंच सकती हैं।
उनका कहना है कि ऐसा होने पर माणा की वह पहचान प्रभावित हो सकती है, जिसके कारण उसे उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक परंपराओं के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देखा जाता है।
रावत ने कहा कि आध्यात्म आधारित संस्कृति के उपासना स्थलों को प्लेजर टूरिज्म से दूर रखा जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में ऐसे कई अन्य क्षेत्र हैं जहां सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है और वहां इस तरह के आयोजन किए जा सकते हैं।
बदरीनाथ सांस्कृतिक महोत्सव को लेकर पहले से विवाद
गौरतलब है कि बदरीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में 19 और 20 सितंबर को देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव-2026 आयोजित किया गया था।
आयोजन भारतीय सेना और चमोली जिला प्रशासन की ओर से ऑपरेशन सद्भावना के तहत किया गया था।
कार्यक्रम में लोकनृत्य, लोकसंगीत, स्थानीय उत्पाद और सीमांत क्षेत्र की संस्कृति को प्रदर्शित किया गया।
कार्यक्रम के दौरान संगीत और नृत्य के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद बदरीनाथ धाम की धार्मिक गरिमा तथा ऐसे आयोजनों के स्वरूप को लेकर विवाद शुरू हुआ।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज ने बाद में सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर रोक की चर्चाओं को निराधार बताते हुए कहा कि कार्यक्रम मंदिर परिसर के बजाय नर पर्वत स्थित टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में हुआ था।
इसी विवाद के बीच हरीश रावत की यह टिप्पणी सामने आई है।
उन्होंने अपने बयान में मूल सवाल यही उठाया है कि बदरीनाथ और माणा जैसे क्षेत्रों में पर्यटन के विस्तार के साथ उनकी आध्यात्मिक पहचान और सांस्कृतिक मर्यादा को किस प्रकार सुरक्षित रखा जाए।
रावत का संदेश
हरीश रावत ने कहा कि “आध्यात्म पुरुष आप हैं और चोट हमको लग रही है आपके बयान से।”
उनके बयान ने बदरीनाथ में पर्यटन, संस्कृति और धार्मिक मर्यादा के बीच संतुलन को लेकर चल रही बहस को एक नया राजनीतिक-सामाजिक संदर्भ दे दिया है।