देहरादून – यहां उत्तान का अर्थ ऊपर की और उठा हुआ और पाद का अर्थ पैर है। इस आसन में पैरों को ऊपर उठाया जाता है। इसी कारण इस आसन का नामकरण उत्तानपादासन हुआ।
इस आसन को करने से होते है ये लाभ
यह आसन नाभि केंद (नाभि, मणिपुर चक्र) में संतुलन स्थापित करता है।यह उदर पीड़ा, वाई (उदर वायु), अपच और अतिसार (दस्त) को दूर करने में सहायक होता है।यह उदर की मांसपेशियों को मजबूती प्रदान करता है।
यह आसन अवसाद और चिंताओं से उबरने में सहायक होता है।यह पाचन क्रिया को और फेफड़ों की क्षमता में वृद्धि करने में सहायक है।गहरे तनाव और कमर दर्द से पीड़ित व्यक्ति बिना श्वास रोके बारी-बारी से अपने पैरों का उपयोग करते हुए इस आसन का अभ्यास करें।
“अर्धहलासन”
अर्थ का अर्थ “आधा” और “हल” का अर्थ है खेत जोतने वाला हल। इस आसन में शरीर की स्थिति खेतों की जुताई करने वाले भारतीय हल की अर्धआकृति जैसी होती है। इसी कारण इसका नाम हलासन पड़ा।
इस आसन को करने से होते है ये लाभ:
यह आसन बदहजमी और कब्जियत से छुटकारा दिलाता है।यह आसन मधुमेह और बवासीर समस्याओं से छुटकारा दिलाने में सहायक है।
यह आसन गहरे तनाव से ग्रस्त व्यक्तियों के लिए अत्यंत लाभदायक है, परंतु उन्हें बड़ी सावधानी पूर्वक किसी योग विशेषज्ञ की देखरेख में यह आसन करना चाहिए।
“पवनमुक्तासन”
पवन शब्द का अर्थ वायु और मुक्त शब्द का अर्थ छोड़ना या मुक्त करना है। जैसा कि इस अभ्यास के नाम से की पता चलता है, यह आसन अदर एवं आंतों से वायु या वात बाहर निकालने में उपयोगी है।
इस आसन को करने से होते है ये लाभ:
कब्जियत दूर करता है, वात से राहत दिलाता है और उदर के फैलाव को कम करता है। पाचन क्रिया में भी सहायता करता है।
गहरा आंतरिक दवाव उत्पन्न करता है, श्रोणि और कटिक्षेत्र में मांसपेशियों, लिंगामेंट्स और स्नायु की अति जटिल समस्याओं का निदान करता है और उनमें कसावट लाता है।
यह पीठ की मांसपेशियों और मेरु के स्नायुओं को सुगठित बनाता है।
