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Space Science :- यूसैक में चंद्रयान-3 की सफलता से लेकर आपदा प्रबंधन तक, अंतरिक्ष तकनीक की भूमिका पर हुआ मंथन

देहरादून 23 अगस्त 2026।

उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) में शनिवार को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस उत्साह और गरिमा के साथ मनाया गया।

कार्यक्रम का उद्देश्य भारत की अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उपलब्धियों को रेखांकित करने के साथ-साथ विद्यार्थियों,

शोधार्थियों और आमजन में अंतरिक्ष विज्ञान के प्रति जागरूकता एवं रुचि को बढ़ावा देना रहा।

इस अवसर पर वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों और छात्रों ने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के वर्तमान और भविष्य पर विस्तृत चर्चा की।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (आईआईआरएस) के वरिष्ठ वैज्ञानिक,

एवं पूर्व डीन डॉ. प्रमोद कुमार ने अपने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से भारत की अंतरिक्ष यात्रा,

चंद्रयान-3 की ऐतिहासिक उपलब्धि और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के बढ़ते उपयोग पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस भारत की वैज्ञानिक क्षमता, दृढ़ संकल्प और नवाचार की भावना का प्रतीक है।

यह दिन उस गौरवपूर्ण क्षण की याद दिलाता है जब भारत ने चंद्रयान-3 के माध्यम से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में सफल सॉफ्ट लैंडिंग कर विश्व मंच पर अपनी वैज्ञानिक श्रेष्ठता का परिचय दिया।

डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम केवल अंतरिक्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विज्ञान को समाज और विकास से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन चुका है।

आज रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस), मौसम पूर्वानुमान, संचार उपग्रह, नेविगेशन, कृषि, जल संसाधन प्रबंधन,

वन संरक्षण, शहरी नियोजन और आपदा प्रबंधन जैसे अनेक क्षेत्रों में अंतरिक्ष तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

उन्होंने कहा कि विकसित भारत के निर्माण में अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका लगातार बढ़ेगी और भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र में और अधिक मजबूत पहचान स्थापित करेगा।

इससे पूर्व यूसैक के निदेशक प्रो. दुर्गेश पंत ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि उत्तराखंड की भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों को देखते हुए।

रिमोट सेंसिंग, जीआईएस, ड्रोन तथा उपग्रह आधारित तकनीकों का उपयोग विभिन्न विकासात्मक और प्रशासनिक कार्यों में प्रभावी ढंग से किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, वनाग्नि, बाढ़, जल संसाधनों के आकलन, भूमि उपयोग परिवर्तन तथा पर्यावरणीय निगरानी में अंतरिक्ष तकनीक अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है।

प्रो. पंत ने कहा कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी केवल विकास का साधन नहीं,

बल्कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन का प्रभावी माध्यम भी है।

उन्होंने बताया कि यूसैक समय-समय पर सेमिनार, कार्यशालाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन कर विद्यार्थियों,

शोधार्थियों तथा विभिन्न विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों को अंतरिक्ष एवं भू-स्थानिक तकनीकों के उपयोग संबंधी प्रशिक्षण उपलब्ध कराता है।

उन्होंने कहा कि यूसैक का उद्देश्य राज्य की भौगोलिक एवं प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप अंतरिक्ष विज्ञान और भू-स्थानिक तकनीकों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना है,

ताकि वैज्ञानिक आंकड़ों और सूचनाओं को नीति निर्माण तथा जनहित के कार्यों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया जा सके।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अंतरिक्ष तकनीक उत्तराखंड के सुरक्षित, समृद्ध और सतत विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

कार्यक्रम का संचालन यूसैक की वैज्ञानिक डॉ. सुषमा गैरोला ने किया।

कार्यक्रम में शिक्षाविद प्रो. रीमा पंत, यूसैक के वैज्ञानिक डॉ. आशा थपलियाल,

डॉ. गजेन्द्र सिंह, पुष्कर कुमार, शशांक लिंगवाल और डॉ. दिव्या उनियाल, जनसंपर्क अधिकारी सुधाकर भट्ट,

देवेश कपरवान, शोधार्थियों तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने प्रतिभाग किया।

राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम ने न केवल भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियों को रेखांकित किया,

बल्कि युवाओं को विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने का भी महत्वपूर्ण कार्य किया।

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