पितृ पक्ष के बीच जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया या जिउतिया व्रत के नाम से भी जाना जाता है, श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जा रहा है।
यह व्रत विशेष रूप से माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और मंगलकामना के लिए रखती हैं।
धार्मिक परंपरा में इस व्रत को कठिन व्रतों में शामिल माना जाता है,
क्योंकि कई परंपराओं में महिलाएं निर्जला उपवास रखकर भगवान जीमूतवाहन की पूजा करती हैं।
संतान की मंगलकामना के लिए रखा जाता है व्रत
धार्मिक मान्यता के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जुड़ा है।
माताएं पूरे श्रद्धाभाव से व्रत रखती हैं और भगवान जीमूतवाहन से अपनी संतान के सुखी, स्वस्थ और दीर्घ जीवन की प्रार्थना करती हैं।
इस व्रत की परंपरा मुख्य रूप से उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
उत्तराखंड सहित बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में भी इसे श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
जितिया व्रत की पौराणिक कथा
जितिया व्रत से जुड़ी प्रमुख कथा राजा जीमूतवाहन से संबंधित है। धार्मिक कथा के अनुसार जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का त्याग करने का संकल्प लिया था।
उनकी करुणा, त्याग और परोपकार से जुड़ी कथा को ही इस व्रत की धार्मिक परंपरा से जोड़ा जाता है।
मान्यता है कि जीमूतवाहन की पूजा करने से संतान की रक्षा और परिवार के मंगल की कामना पूरी होती है। इसी विश्वास के साथ माताएं श्रद्धापूर्वक यह व्रत करती हैं।
व्रत में संयम और नियम का विशेष महत्व
जितिया व्रत में व्रती महिलाएं स्नान आदि के बाद संकल्प लेती हैं और दिनभर व्रत रखती हैं। कई परंपराओं में यह निर्जला व्रत होता है।
व्रत के दौरान भगवान जीमूतवाहन का पूजन, कथा श्रवण और संतान की मंगलकामना की जाती है।
व्रत की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में कुछ भिन्न हो सकती है।
इसलिए स्थानीय परंपरा और परिवार की धार्मिक मान्यता के अनुसार पूजा करना उचित माना जाता है।
पितृ पक्ष में जितिया का संयोग
इस वर्ष जीवित्पुत्रिका व्रत का पितृ पक्ष के दौरान पड़ना धार्मिक दृष्टि से विशेष संयोग माना जा रहा है।
एक ओर जहां पितृ पक्ष में पूर्वजों के लिए तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य किया जा रहा है,
वहीं दूसरी ओर माताएं संतान के उज्ज्वल भविष्य और दीर्घायु की कामना के लिए जितिया व्रत कर रही हैं।
व्रत के दौरान रखें इन बातों का ध्यान
व्रत रखने से पहले अपनी परंपरा के अनुसार पूजा-विधि और तिथि की पुष्टि करें।
निर्जला व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखें।
पूजा के दौरान भगवान जीमूतवाहन का स्मरण और व्रत कथा का श्रवण करें।
संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना करें।
व्रत का पारण स्थानीय पंचांग में दिए गए समय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार करें।
जितिया व्रत का संदेश
जीवित्पुत्रिका व्रत केवल उपवास की परंपरा नहीं, बल्कि मां और संतान के बीच प्रेम, त्याग, ममता और मंगलकामना का प्रतीक भी माना जाता है।
व्रत के माध्यम से माताएं अपनी संतान के स्वस्थ और सुखी जीवन के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती हैं।
धार्मिक तिथियां और व्रत-पारण के समय स्थान के अनुसार अंतर हो सकता है।
इसलिए पूजा और पारण के लिए स्थानीय पंचांग अथवा आचार्य द्वारा निर्धारित समय को प्राथमिकता देना उचित है।