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Story :- एक फुटबॉल खिलाड़ी की ज़ुबानी उनकी जिंदगी के संघर्षों की कहानी

देहरादून 4 सितम्बर 2026।

डॉ. वीरेन्द्र सिंह रावत पूर्व नेशनल फुटबॉल खिलाड़ी की ज़ुबानी उनकी  जिंदगी के संघर्षों, दुर्घटनाओं, दर्द, धोखे और चुनौतियों से भरी कहानी।

डॉ रावत ने कहा कि मैंने जिंदगी में बार-बार गिरना सीखा, लेकिन उससे भी ज्यादा बार उठना सीखा।

शरीर पर चोटें लगीं, मन को ठेस पहुंची, आर्थिक संकट आए, अपनों को खोया, लेकिन मैंने कभी हार नहीं मानी।

आज 57 वर्ष की उम्र में पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि मेरी जिंदगी की हर दुर्घटना ने मुझे और मजबूत बनाया।

मेरी कहानी सिर्फ दुर्घटनाओं की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष के बाद सफलता और हार के बाद जीत की कहानी है।

 जन्म से ही संघर्ष-

जब मेरा जन्म हुआ तो मैं उल्टा पैदा हुआ। मेरी मां को बहुत पीड़ा सहनी पड़ी और मैंने जीवन की शुरुआत संघर्ष से की। शायद यही संघर्ष आगे चलकर मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया।

. छह महीने की उम्र में पहली चोट

जब मैं केवल छह महीने का था, तब मेरे बाएं हाथ की उंगलियां टूट गई थीं। उन टूटी हुई उंगलियों के निशान आज भी मेरे हाथ पर हैं। करीब 30 वर्षों तक उस चोट का दर्द सहता रहा।

. दस वर्ष की उम्र में ट्रक से दुर्घटना

10 वर्ष की उम्र में मेरी साइकिल की एक ट्रक से टक्कर हो गई। गंभीर चोट लगी, लेकिन भगवान की कृपा से मेरी जान बच गई।

. 20 वर्ष की उम्र में खेल के दौरान गंभीर चोट

20 वर्ष की उम्र में फुटबॉल खेलते समय एक खिलाड़ी से मेरी छाती पर गंभीर चोट लगी। करीब छह महीने तक उस चोट का दर्द सहना पड़ा।

. 24 वर्ष की उम्र में रीढ़ की हड्डी में चोट

24 वर्ष की उम्र में खेलते समय एक खिलाड़ी की वजह से मेरी रीढ़ की हड्डी में माइनर फ्रैक्चर हुआ।

करीब छह महीने तक दोनों हाथ सुन्न रहे। धीरे-धीरे उपचार और हिम्मत से स्वस्थ हुआ और फिर मैदान पर लौट आया।

. रामपुर तिराहा कांड में जिंदगी बचाकर लौटना

2 अक्टूबर 1994 को 24 वर्ष की उम्र में मैं उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी के रूप में अलग राज्य की मांग को लेकर हजारों युवाओं के साथ आंदोलन में शामिल हुआ।

रामपुर तिराहा, मुजफ्फरनगर में पुलिस की गोलीबारी के दौरान जान बचाकर निकलना पड़ा।

तीन दिन तक भूखे-प्यासे रहने के बाद किसी तरह अपने घर पहुंचा। वह अनुभव आज भी मेरी जिंदगी की सबसे कठिन यादों में से एक है।

. खेल उपलब्धियों के बावजूद प्रमाणपत्र किसी और को

1996 और 1998 में मैंने अंडर-16 और अंडर-19 राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल खेला, लेकिन मेरी मेहनत का प्रमाणपत्र किसी और को दे दिया गया।

यह मेरे लिए बेहद पीड़ादायक था, लेकिन मैंने खेलना और आगे बढ़ना नहीं छोड़ा।

. नौकरी के अवसर भी छिनते रहे

मैंने सरकारी नौकरियों की परीक्षाएं पास कीं। पोस्ट ऑफिस में हेड पोस्टर, PWD में अकाउंट्स और रेलवे में इंजीनियर पद के अवसर मिले,

लेकिन मेरी जगह कथित तौर पर पैसे लेकर किसी और को नौकरी दिए जाने से मुझे अवसर नहीं मिल पाया। मैंने उस पीड़ा को भी सहा और आगे बढ़ता रहा।

. मसूरी से लौटते समय जानलेवा सड़क दुर्घटना

29 वर्ष की उम्र में मसूरी से नौकरी करके रात करीब 10 बजे मोटरसाइकिल से लौट रहा था। एक अज्ञात कार ने मेरी मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी।

मैं गहरी खाई में जा गिरा। मेरे जबड़े में गंभीर चोट आई और मैं बेहोश हो गया।

उस समय दो युवा मेरे लिए भगवान के रूप में आए। उन्होंने मेरी जान बचाई। करीब छह महीने तक दर्द सहना पड़ा। आज भी मैं उस दुर्घटना की याद अपने चेहरे और दांतों पर लिए हुएं हूं।

. फुटबॉल मैच के दौरान हमला

1998 में मैं उत्तराखंड का रेफरी बन चुका था। वर्ष 2001 में देहरादून फुटबॉल लीग के सेमीफाइनल में मैं असिस्टेंट रेफरी था।

मुख्य रेफरी की एक गलती के बाद हार रही टीम के खिलाड़ियों ने मुझ पर हमला कर दिया और मुझे बुरी तरह पीटा।

शरीर पर चोटें आईं और कई महीनों तक दर्द रहा। उस समय मुख्य रेफरी मौके से चला गया, लेकिन मैंने रेफरिंग नहीं छोड़ी।

. 2003 से 2010 तक बार-बार मारपीट और संघर्ष

वर्ष 2003, 2008, 2009 और 2010 में देहरादून लीग के दौरान भी मुझे कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा,

जहां वरिष्ठ रेफरियों की गलतियों का खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा। विरोधी खिलाड़ियों ने मेरे साथ मारपीट की। हर बार चोट लगी, लेकिन हर बार मैं मैदान पर वापस आया।

. कोच और रेफरी बनने का सपना टूटा

मेरी तमन्ना थी कि मैं एक बड़ा कोच और रेफरी बनूं। लेकिन फुटबॉल प्रशासन से जुड़े एक पदाधिकारी ने करीब 12 वर्षों तक मेरा उपयोग किया और बाद में मुझे अलग कर दिया।

इसके बाद लंबे समय तक मानसिक और आर्थिक तनाव झेला। कर्ज बढ़ता गया। अंततः मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी और आगे का जीवन संघर्ष के साथ शुरू किया।

. 2013 की उत्तराखंड आपदा में फंसा

2013 की भयंकर उत्तराखंड आपदा के दौरान मैं फुटबॉल टूर्नामेंट कराने मुनस्यारी गया था।

अचानक आई आपदा में मैं फंस गया। भूखे-प्यासे रहकर पांच दिन बाद किसी तरह अपनी जान बचाते हुए घर पहुंचा।

. 2015 में देहरादून फुटबॉल अकादमी का संघर्ष

जून 2015 में मेरी देहरादून फुटबॉल अकादमी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ। मुझे पुलिस और कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा।

करीब ढाई वर्ष तक केस लड़ा। लाखों रुपये का कर्ज हो गया और जीवन बेहद कठिन दौर में पहुंच गया।

उस समय मैं मानसिक रूप से इतना टूट गया था कि मैंने अपनी जिंदगी समाप्त करने का प्रयास किया, लेकिन मेरी धर्मपत्नी ने मुझे बचा लिया।

बाद में मुझे क्लीन चिट मिली। आर्थिक संकट के कारण जमीन तक बेचनी पड़ी। समाज के ताने भी सुने, लेकिन कुछ अच्छे लोगों ने मेरे खेल कार्यों को समझा और सम्मान दिया।

. 2019 में माता-पिता को खोया

वर्ष 2019 में मेरी माताजी और पिताजी का अचानक निधन हो गया। यह मेरे जीवन का ऐसा दुख था जिसने मुझे भीतर तक तोड़ दिया। माता-पिता को खोने का दर्द आज भी मेरे साथ है।

. कोरोना काल का संघर्ष

वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के दौरान मैंने अपनों को खोया और स्वयं भी कठिन समय से गुजरा। इसके बावजूद समाज की मदद करने का प्रयास किया और जरूरतमंदों के लिए रक्तदान सहित विभिन्न सामाजिक कार्य किए।

. 2024 में लोहे की चादर सिर पर गिरी

वर्ष 2024 में देहरादून फुटबॉल अकादमी का मैदान किराये पर लेकर वहां काम करवा रहा था। इसी दौरान लोहे की एक बड़ी चादर मेरे नाक और चेहरे पर गिर गई। गंभीर चोट लगी, लेकिन भगवान की कृपा से मेरी जान बच गई।

. 2025 में पैर में गंभीर चोट

वर्ष 2025 में मेरे पैर में गंभीर चोट लगी। काफी दर्द सहना पड़ा, लेकिन उपचार और हिम्मत के साथ मैं फिर खड़ा हुआ।

. जिंदगी में अनगिनत दुर्घटनाएं

मेरी जिंदगी में ऐसी कई दुर्घटनाएं हुई हैं जिन्हें आज याद करना भी मुश्किल है। कई बार मुझे नुकसान पहुंचाने की कोशिशें भी हुईं, लेकिन मां भगवती की कृपा से मैं हर बार बचता गया।

हर बार गिरा, हर बार खड़ा हुआ

आज मेरी उम्र 57 वर्ष है। जिंदगी ने मुझे बार-बार गिराया।

गिरा—फिर खड़ा हुआ।

फिर गिरा—फिर खड़ा हुआ।

चोट लगी—फिर मैदान में उतरा।

हार मिली—फिर संघर्ष किया।

धोखा मिला—फिर भी कर्म करता रहा।

मैंने गरीबी देखी, कर्ज देखा, अपमान सहा, चोटें खाईं, अपनों को खोया, नौकरी छोड़ी, जमीन बेची और आर्थिक संकटों का सामना किया।

लेकिन मैंने कभी किसी का बुरा करने का रास्ता नहीं चुना। मैंने अहिंसा, मेहनत और कर्म को अपना आधार बनाया।

आज भी लाखों रुपये का कर्ज लेकर समाज और खेल के लिए कार्य कर रहा हूं। मैंने अपने स्वार्थ से ज्यादा खेलों के विकास और युवाओं के भविष्य को महत्व दिया।

मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं है कि मुझे कितने पुरस्कार मिले। मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि मैंने हजारों युवाओं, खिलाड़ियों, रेफरियों और कोचों के भविष्य को बनाने में अपना योगदान दिया।

आज मुझे राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक सम्मान और पुरस्कार मिल चुके हैं और खेल जगत में अपनी एक अलग पहचान बना पाया हूं।

मेरी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।

जब तक शरीर में अंतिम सांस है, मेरा जीवन खेलों के उचित विकास, युवाओं के उज्ज्वल भविष्य और समाज की सेवा के लिए समर्पित रहेगा।

मैं गिर सकता हूं, लेकिन रुकूंगा नहीं।

मैं थक सकता हूं, लेकिन हार नहीं मानूंगा।

क्योंकि मेरी जिंदगी ने मुझे एक ही बात सिखाई है—

“हार के बाद ही असली जीत की शुरुआत होती है।”

27,000 से अधिक खिलाड़ियों, रेफरियों और कोचों के भविष्य को दिशा देने का प्रयास मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी संतुष्टि है।

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