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Tapori:- सड़क से संसद तक “टपोरी” शब्द भाषा या स्टाइलिस्ट !

देहरादून 3 अप्रैल 2026।

डॉ. सुशील उपाध्याय कहते हैं कि  सामान्य परिस्थितियों में यही उम्मीद की जाती है कि अमानक अथवा स्लैंग भाषा के शब्द संसदीय भाषा का हिस्सा नहीं बनेंगे,

लेकिन जब फिल्म जगत के लोग राजनीति और संसद तक जाते हैं तो वे कई बार, चाहे अनचाहे, उस भाषा को भी साथ ले जाते हैं।

जो प्रायः मुंबई की सड़क-भाषा मानी जाती है। इन दिनों “टपोरी” शब्द चर्चा में है,

जो सांसद कंगना रनौत द्वारा लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के लिए इस्तेमाल किया गया है।

शाब्दिक रूप से इसका अर्थ है- सड़कछाप।

अंग्रेज़ी में कई जगह इसे “रोडसाइड लोफर” अथवा “स्ट्रीट स्मार्ट” के रूप में भी ग्रहण किया गया है।

कभी-कभी इसका अर्थ छुटभैया, मवाली अथवा आवारा के रूप में भी लिया जाता है।

यह शब्द मुख्यतः मायानगरी मुंबई के सड़कछाप छोटे-मोटे बदमाशों के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह मराठी से हिंदी में पहुँचा है।

और हिंदी फिल्मों ने इसे व्यापक रूप से विस्तार दिया है।हालाँकि मराठी भाषा में “टपोरी” शब्द का वास्तविक अर्थ पूर्ण विकसित अथवा खिले हुए के रूप में होता है,

लेकिन समय के साथ इसने अन्य अनेक दिशाओं में अर्थ-परिवर्तन किया और यह ऐसे युवाओं के लिए प्रयुक्त होने लगा जो शरारती, ऊर्जा से भरपूर,

दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ऊटपटांग हरकत करने वाले, प्रभुत्व दिखाने वाले, दादागिरी करने वाले और बेवजह छोटी-बड़ी चीज़ों में टांग घुसाने वाले होते हैं।

विस्तृत संदर्भ में यह एक व्यापक अर्थ वाला शब्द है, जो एक पूरी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। टपोरी लोगों की अपनी अलग भाषा है।

उनके रहन-सहन तथा बर्ताव का भी अलग स्टाइल है। भले ही सभ्य लोग टपोरी संस्कृति को नापसंद करते हों, लेकिन कई बार इसे मनोरंजन के रूप में भी अपनाया गया है।

इस संस्कृति के दर्शन “रंगीला” फिल्म से लेकर “सत्या” फिल्म तक में किए जा सकते हैं।

“मुन्ना भाई एमबीबीएस” में संजय दत्त और “बेशरम” फिल्म में रणबीर कपूर टपोरी किरदार के रूप में लोगों के सामने आते हैं।

हिंदी फिल्मों में इस शब्द को ऐसे युवाओं के लिए भी प्रयुक्त किया जाने लगा जो कूल और मस्त हों।

यानी इसकी यात्रा सड़कछाप, छूटभैया बदमाश से लेकर एक मस्तमौला और अपनी धुन में रहने वाले युवा तक पहुँच गई।

असल में, जिसे हम टपोरी भाषा या टपोरी स्टाइल कह रहे हैं, उसमें उर्दू, मराठी, गुजराती, अंग्रेज़ी और हिंदी भाषा के चलताऊ शब्दों की भरमार होती है।

ये शब्द भले ही मानक नहीं हैं, लेकिन इनकी संप्रेषणीयता बहुत व्यापक होती है। हिंदी फिल्मों में जहाँ भी “कटिंग चाय”, “बॉस”, “भीड़ू”, “छोटे”,

“तेरे को”, “मेरे को”, “अपुन”, “दादा”, “ढपलू” आदि शब्द दिखाई दें, तो समझिएगा कि यह टपोरी भाषा का हिस्सा हैं।

समय के साथ फिल्म जगत ने इस शब्द के ज़रिए बगावती अंदाज़ वाले कूल व्यक्ति की छवि गढ़ी।

चूंकि ये शब्द परिनिष्ठित एवं मानक भाषा का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए औपचारिक एवं मानक लिखित भाषा में (फिल्मी लेखन को छोड़कर) इनका प्रयोग प्रायः देखने को नहीं मिलता,

लेकिन मुंबई की मिली-जुली भाषा में इनका बहुतायत से प्रयोग होता है। यह भी कहा जा सकता है कि टपोरी भाषा सड़क की भाषा है,

इसलिए यह सड़क किनारे के छोटे-मोटे काम-धंधों से लेकर भीख मांगने वालों की ज़ुबान तक पर मौजूद है।

विविध अर्थों वाला यह शब्द मूलतः अपमानजनक नहीं है। न केवल मराठी, बल्कि आसपास की अन्य भाषाओं में भी चाय की छोटी दुकान को “खोखा” अथवा “टपरी” कहा जाता है।

हालांकि टपोरी भाषा में “खोखा” का अर्थ करोड़ रुपये के संदर्भ में भी ग्रहण किया जाता है, जबकि “टपरी” एक ऐसा ठिकाना है।

जहां निठल्ले, शौकीन मिजाज और शरारती नौजवान अपना अड्डा बनाते हैं।

संभवतः टपरी पर अपना ठिकाना जमाने वालों के लिए “टपोरी” शब्द प्रचलित हुआ है।

इसी प्रकार बिहार और पूर्वांचल में प्रचलित “छपरी” शब्द भी “टपोरी” के काफ़ी निकट है, जो बिंदास, सड़कछाप या अनौपचारिक अंदाज़ वाले व्यक्ति के लिए प्रयोग होता है।

“टपोरी” और “छपरी” अलग-अलग क्षेत्रों के शब्द हैं, लेकिन इनके अर्थ और व्यवहार में काफी समानता दिखाई देती है।

वैसे छपरी का संबंध छप्पर के साथ भी है। छप्पर का लघु रूप छपरी है, जो टपरी जैसा ही भाव रखता है।

समानता के नियम के आधार पर देखें तो जिस प्रकार टपरी के आसपास रहने वाले टपोरी हैं, उसी प्रकार छपरी के आसपास रहने वाले छपोरी होने चाहिए थे,

लेकिन चलन में छपरी ही आ गया है।सांसद कंगना रनौत द्वारा राहुल गांधी को “टपोरी” बताए जाने को नकारात्मक अर्थ में लिया गया,

जबकि प्रचलित अर्थ की दृष्टि से इसका अर्थ अपनी मौज में रहने वाले, थोड़े-से लापरवाह,

गैर-गंभीर और चुहल करने वाले व्यक्ति के लिए भी उपयुक्त जान पड़ता है। इस शब्द के अन्य संदर्भों को देखें तो यह मुंबई की सड़कों से निकलकर थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक तक पहुंच गया है।

वहां “टपोरी बैंकॉक” नाम से एक चर्चित रेस्टोरेंट है। जैसा कि ऊपर कहा गया, “टपोरी” का संबंध “टपरी” से भी जुड़ता है, और भारत में एक-दो नहीं बल्कि दर्जनों स्थान “टपरी” नाम वाले हैं।

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर ज़िले में एक गांव का नाम टपरी है। सहारनपुर में “टपरी” नाम का एक रेलवे जंक्शन है। उत्तराखंड के कुमाऊँ में भी टपरी नाम का गण है।

राजस्थान के जयपुर में भी टपरी गांव मौजूद है। इन स्थानों के नामों के बाद यह सहज सवाल पैदा होता है।

कि यदि “टपरी” के साथ “टपोरी” जुड़ा है, तो फिर इन स्थानों की भाषाओं में भी “टपोरी” शब्द होना चाहिए।

भले ही यह शब्द कुछ दशक पहले तक वहां नहीं था, लेकिन अब यह अवश्य पहुंच गया है। इस शब्द के लोक-व्यवहार में आने की अवधि आधी सदी से अधिक की है।

एटीडी फोर्थ वर्ल्ड नाम के संगठन ने इस शब्द को एक नया ही अर्थ दिया है। इस संगठन का बच्चों का नेटवर्क “टपोरी” नाम से जाना जाता है।

इसका संबंध भी मुंबई से ही है। इस संस्था के संस्थापक जोसेफ ओवरेन्स्की ने मुंबई में स्टेशनों पर घूमने वाले बच्चों को इस संस्था के साथ जोड़ा और उन्हें “टपोरी” नाम दिया।

इसके पीछे मूल वजह यह थी कि ये बच्चे आवारागर्दी के दिनों में भी न केवल एक-दूसरे की मदद करते थे, बल्कि अपने कामकाज को एक समूह के रूप में पूरा करते थे।

इस संस्था ने “टपोरी” को नया अर्थ प्रदान किया—जिम्मेदार और दूसरों का ध्यान रखने वाले बच्चे।हिंदी और मराठी के विद्वान डॉ. अंशुमान मिश्र लिखते हैं,

देशज शब्द रूढ़ हो जाते हैं, चाहे उनके अर्थ किसी भी भाषा में क्यों ना परिवर्तित हो जाएं।

लेकिन लोक द्वारा बनाई गई भाषा शब्दावली उनके उपयोग एवं प्रचलन में सदियों तक रहती है।

मराठी में इस शब्द का अर्थ विस्तार करने वाले केवल फिल्म अभिनेता या निर्माता नहीं है, उससे अधिक साहित्यकार एवं भाषाविद हैं।

इसे मुख्यधारा के साहित्य और विमर्श में पहचान दिलाने का श्रेय अक्सर 1970 और 80 के दशक के उन लेखकों को दिया जाता है जिन्होंने मुंबई के अंडरवर्ल्ड या झुग्गी-झोपड़ियों के जीवन पर लिखा

(जैसे दया पवार और नामदेव ढसाळ)। टपोरी का सूक्ष्म अध्ययन करेंगे तो यह तथ्य सामने आता है कि यह शब्द विशेष रूप से मराठी एवं गुजराती का प्रचलित शब्द है।

यह शब्द मराठी अभिजात भाषा का नहीं है। इसी प्रकार एक और शब्द है, जिसे वर्तमान पत्रों में एवं संचार समाचारों में अधिक रूप से सुना एवं पढ़ा जाता है, वह है रोड रोमियो।

इस शब्द पर भी विचार किया जाना चाहिए। इस शब्द के जन्मदाता मूल रूप से पुलिस वाले हैं जो इसे कॉलेज के बाहर लड़कियों को छेड़ने वाले लड़कों के लिए प्रयोग करते हैं।

इसमें दोनों शब्द इंग्लिश भाषा के हैं लेकिन अभी भारतीय भाषाओ में प्रचलित हो गए हैं और ये टपोरी की तरह पूरे देश में प्रचलन में आ गए हैं।

“टपोरी” के इतने अर्थों को देखने के बाद अब आप स्वयं तय कर सकते हैं कि यह संज्ञा, जिसे राहुल गांधी के लिए विशेषण के रूप में इस्तेमाल किया गया,

कितनी उचित है और कितना अनुचित। हालाकि, इसमें कोई संदेह नहीं है कि सांसद कंगना रनौत ने इसे नकारात्मक भाव प्रदर्शित करने के लिए ही इस्तेमाल किया है।

वस्तुतः भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण का दर्पण भी है, ऐसे में ‘टपोरी’ जैसे शब्दों का प्रयोग हमारे सांस्कृतिक और राजनीतिक विवेक की भी परीक्षा लेता है।

 

 

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