किच्छा में निकाय चुनाव का मतदान समाप्त हो गया, मतदाताओं ने अपना फैसला मतपेटियों में बंद कर दिया और लोकतंत्र की अगली प्रक्रिया के लिए मतपेटियां स्ट्रांग रूम में पहुंचा दी गईं।
लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ, उसने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और राजनीतिक मर्यादा दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नवीन मंडी स्थित स्ट्रांग रूम में मतपेटियों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर आपत्ति सामने आई।
किच्छा विधायक तिलकराज बेहड़ ने मतपेटियों की सुरक्षा व्यवस्था में जाली लगाने और पर्दे से संबंधित व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए।
इसके बाद राजनीतिक समर्थकों के बीच कहासुनी और मारपीट की स्थिति बनी।
मामला धरने तक पहुंचा और बाद में नेशनल हाईवे-74 पर भी हंगामे की स्थिति पैदा हुई। स्थिति नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।
यह पूरा घटनाक्रम सामान्य राजनीतिक बहस मानकर टाल देने वाला नहीं है।
सवाल यह नहीं है कि विवाद में कौन सही था और कौन गलत। सवाल यह है कि आखिर ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई?
चुनाव के बाद स्ट्रांग रूम वह स्थान होता है जहां लोकतंत्र का सबसे संवेदनशील सामान सुरक्षित रखा जाता है।
वहां सुरक्षा व्यवस्था को लेकर यदि किसी प्रत्याशी या राजनीतिक दल को संदेह होता है तो उस संदेह का तत्काल और पारदर्शी समाधान होना चाहिए।
प्रशासन को मौके पर मौजूद सभी अधिकृत प्रतिनिधियों के सामने नियमों और सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए,
ताकि किसी भी पक्ष को आशंका व्यक्त करने की जरूरत ही न पड़े।
लोकतंत्र में संदेह की उम्र छोटी होनी चाहिए और तथ्य की उम्र लंबी। यदि व्यवस्था पूरी तरह निर्धारित नियमों के अनुसार थी तो प्रशासन को सामने आकर स्पष्ट करना चाहिए कि सुरक्षा प्रोटोकॉल क्या था,
स्ट्रांग रूम की निगरानी किस प्रकार की जा रही थी और अधिकृत प्रतिनिधियों के लिए क्या व्यवस्था थी।
यदि कहीं कोई कमी थी तो उसे भी छिपाने के बजाय स्वीकार कर सुधारना चाहिए।
क्योंकि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता केवल नियमों का पालन करने से नहीं आती, बल्कि नियमों के पालन का भरोसा पैदा करने से आती है।
दूसरी चिंता राजनीतिक व्यवहार को लेकर है। चुनाव लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा है, व्यक्तिगत युद्ध नहीं।
प्रत्याशी जीतने के लिए मैदान में उतरता है, लेकिन हारने के बाद लोकतंत्र को नहीं हारना चाहिए।
समर्थकों के बीच विवाद, धक्का-मुक्की, मारपीट और फिर सड़क पर तनाव की स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है।
राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं की असली परीक्षा ऐसे ही क्षणों में होती है। भीड़ को उत्तेजित करना आसान है, उसे शांत करना नेतृत्व की पहचान है।
किसी भी आरोप का जवाब आरोप से, और किसी विवाद का जवाब शक्ति प्रदर्शन से देने की परंपरा लोकतंत्र को कमजोर करती है।
किच्छा में दोनों पक्षों की ओर से आरोप-प्रत्यारोप सामने आए हैं। इसलिए इस मामले में निष्पक्ष जांच जरूरी है।
घटना के वीडियो फुटेज, मौके पर मौजूद अधिकारियों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान तथा अन्य उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि,
विवाद कैसे शुरू हुआ, किस स्तर पर कानून-व्यवस्था प्रभावित हुई और किसकी क्या भूमिका रही।
कार्रवाई हो तो वह राजनीतिक पहचान देखकर नहीं, साक्ष्यों और कानून के आधार पर हो।
कानून की नजर में राजनीतिक पद और समर्थकों की संख्या किसी को अतिरिक्त अधिकार नहीं देती।
यह बात जिला प्रशासन को भी समझनी होगी और राजनीतिक दलों को भी।
सड़क पर हंगामा लोकतांत्रिक शिकायत का विकल्प नहीं हो सकता। यदि किसी प्रत्याशी को चुनावी प्रक्रिया में आपत्ति है तो उसके लिए जिला निर्वाचन व कानून और निर्धारित शिकायत तंत्र मौजूद है।
अदालतें और जिला निर्वाचन प्राधिकरण इसलिए हैं कि विवादों का समाधान संस्थागत तरीके से हो।
सड़क को न्याय का मंच बनाने की प्रवृत्ति अंततः व्यवस्था पर ही चोट करती है।
लेकिन प्रशासन भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।
चुनावी प्रक्रिया जितनी संवेदनशील होती है, प्रशासनिक संचार उतना ही स्पष्ट होना चाहिए। स्ट्रांग रूम जैसे स्थानों पर छोटी-सी अस्पष्टता भी राजनीतिक विवाद का रूप ले सकती है।
इसलिए भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी के प्रत्येक चरण में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए।
सीसीटीवी निगरानी, निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल, अधिकृत प्रत्याशी प्रतिनिधियों की उपस्थिति,
प्रवेश-निकास की स्पष्ट व्यवस्था और समय-समय पर आधिकारिक जानकारी—ये सभी कदम केवल कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखाई देने चाहिए।
मतदाता ने अपना काम कर दिया है। अब जिम्मेदारी व्यवस्था की है।
उसने मतदान केंद्र तक पहुंचकर अपनी पसंद दर्ज की। उसने यह उम्मीद की कि उसकी वोट की सुरक्षा होगी और उसका फैसला निष्पक्ष रूप से सामने आएगा।
उसके बाद यदि राजनीतिक विवाद सड़क पर दिखाई देता है तो सबसे बड़ा नुकसान किसी एक दल का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का होता है।
किच्छा की घटना से उत्तराखंड की पूरी चुनावी व्यवस्था को सबक लेने की जरूरत है। लोकतंत्र की विश्वसनीयता केवल शांतिपूर्ण मतदान से तय नहीं होती।
मतदान के बाद मतों की सुरक्षा, मतगणना की पारदर्शिता और परिणाम की स्वीकार्यता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
राजनीतिक दलों को भी तय करना होगा कि वे अपने समर्थकों को किस तरह की राजनीति सिखाना चाहते हैं।
तर्क की या टकराव की? प्रशासन को तय करना होगा कि वह शिकायतों का समाधान कितनी तत्परता और पारदर्शिता से करता है।
और जनता को यह महसूस होना चाहिए कि उसकी वोट किसी राजनीतिक शक्ति की जागीर नहीं, बल्कि लोकतंत्र की अमानत है।
किच्छा में उठे सवालों का जवाब केवल बयानबाजी से नहीं मिलेगा। जवाब तथ्यों से, निष्पक्ष जांच से और पारदर्शी कार्रवाई से मिलेगा।
आज आवश्यकता किसी पक्ष को विजेता या दोषी घोषित करने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को मजबूत करने की है जिस पर हर प्रत्याशी, हर राजनीतिक दल और सबसे बढ़कर हर मतदाता भरोसा कर सके।
मतपेटी बंद हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र का सवाल बंद नहीं होना चाहिए। सवाल उठे हैं तो जवाब भी स्पष्ट होना चाहिए।
क्योंकि चुनाव में हार-जीत किसी की हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र का भरोसा हार गया तो नुकसान पूरे समाज का होता है।