पितृ पक्ष के पावन दिनों में सोमवार का दिन विशेष धार्मिक महत्व लेकर आया है।
आज आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि है और इस दिन दशमी श्राद्ध किया जाएगा।
पितृ पक्ष में आने वाली प्रत्येक तिथि अपने आप में महत्वपूर्ण मानी जाती है और जिस पूर्वज का देहांत जिस तिथि को हुआ हो,
सामान्यतः उसी तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म किया जाता है। उत्तराखंड के पंचांग के अनुसार 5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग का भी संयोग बन रहा है।
दशमी तिथि का विशेष महत्व
5 अक्टूबर को आश्विन कृष्ण दशमी तिथि रहेगी, जो 6 अक्टूबर तड़के करीब 2:07 बजे तक रहेगी।
इसके बाद एकादशी तिथि प्रारंभ होगी। हरिद्वार के पंचांग के अनुसार इस दिन सूर्योदय सुबह 6:13 बजे और सूर्यास्त शाम 5:58 बजे होगा।
पितृ पक्ष में दशमी तिथि उन पूर्वजों के लिए श्राद्ध कर्म करने का अवसर प्रदान करती है, जिनका निधन दशमी तिथि को हुआ था।
धार्मिक मान्यता के अनुसार श्राद्ध में श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य किया जाता है।
दशमी श्राद्ध में क्या करें?
दशमी श्राद्ध के दिन प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर घर की परंपरा और कुलाचार के अनुसार श्राद्ध कर्म किया जाता है।
पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण किया जाता है और सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण भोजन, गौ सेवा तथा जरूरतमंदों को अन्न-वस्त्र का दान किया जाता है।
श्राद्ध कर्म में काला तिल, जल, कुश और पिंड का विशेष महत्व माना जाता है। तर्पण के दौरान पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।
मान्यता है कि श्रद्धा से किए गए पितृ कर्म से परिवार पर पितरों की कृपा बनी रहती है और घर में सुख-शांति का वातावरण कायम होता है।
सर्वार्थ सिद्धि योग का भी बन रहा संयोग
5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध के साथ सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। हरिद्वार के पंचांग के अनुसार यह योग सुबह 6:13 बजे से रात 11:09 बजे तक रहेगा।
हालांकि पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार संबंधित तिथि और निर्धारित श्राद्ध काल होता है,
इसलिए केवल योग देखकर श्राद्ध की विधि निर्धारित करने के बजाय पारिवारिक परंपरा और स्थानीय विद्वान आचार्य के निर्देश को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।
श्राद्ध के लिए कौन-सा समय महत्वपूर्ण?
पितृ पक्ष के श्राद्ध कर्म में कुतुप, रौहिण और अपराह्न काल को विशेष महत्व दिया जाता है।
दशमी श्राद्ध की विधि इन्हीं निर्धारित श्राद्ध कालों में स्थानीय पंचांग के अनुसार की जाती है।
श्राद्ध कर्म के बाद पितरों के निमित्त तर्पण किया जाता है। इसके अलावा जरूरतमंदों को भोजन कराना, अन्न एवं वस्त्र का दान करना और गौ सेवा करना भी धार्मिक दृष्टि से पुण्यकारी माना जाता है।
सोमवार होने से भगवान शिव की आराधना का भी अव
5 अक्टूबर को सोमवार होने के कारण भगवान शिव की पूजा का भी विशेष महत्व है।
श्रद्धालु सुबह स्नान के बाद शिवलिंग पर जल अर्पित कर ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप कर सकते हैं।
पितरों के निमित्त तर्पण और भगवान शिव की आराधना के माध्यम से दिन को आध्यात्मिक रूप से विशेष बनाया जा सकता है।
पितृ पक्ष में दिखावे से अधिक श्रद्धा को महत्व
सनातन परंपरा में श्राद्ध का मूल भाव श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता माना गया है।
इसके लिए बहुत अधिक खर्च करना आवश्यक नहीं माना जाता। अपनी सामर्थ्य के अनुसार तर्पण,
भोजन और दान-पुण्य करना तथा पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करना ही इस पर्व की मूल भावना है।
पितृ पक्ष 2026 में 5 अक्टूबर को दशमी श्राद्ध के बाद 6 अक्टूबर को एकादशी श्राद्ध,
7 अक्टूबर को द्वादशी एवं मघा श्राद्ध, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी, 9 अक्टूबर को चतुर्दशी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा।
धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध, तर्पण और दान से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार को सुख, शांति एवं समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
हालांकि श्राद्ध की विधि अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में भिन्न हो सकती है, इसलिए कर्मकांड करते समय अपने कुलाचार और स्थानीय आचार्य की सलाह का पालन करना उचित है।