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DehradunNews:-कुण्डलिनी जागरण के उपाय भाग छः

देहरादून -कुंडलिनी जागृत करने की इच्छा रखने वाले साधक को प्रतिदिन भस्रिका प्राणायाम, कपालभाति, बाह्य प्राणायाम और अनुलोम-विलोम करना चाहिए।

इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि मूलाधार चक्र के जागृत होने पर अन्य चक्रों का भी जागरण स्वतः होने लगता है और दिव्य शक्ति ऊर्ध्वगामिनी हो जाती है।

यही कुण्डलिनी जागरण है। वैज्ञानिक शब्दों में कहा जाये तो यह कुण्डलिनी वह दिव्य मानस तेज है जो शरीर भर में व्याप्त है। साधक को प्राण-साधना द्वारा चक्रों का शोधन, भेदन एवं जागरण अधोलिखित मुख्य उपायों द्वारा (किसी सत्पुरुष योग- साधक से प्रशिक्षण प्राप्त करके) करना चाहिए।

कुंडलिनी जागृत करने की इच्छा रखने वाले साधक को प्रतिदिन संयम और अनुष्ठान, निरंतरता, लय, तन्मय और विश्वास के साथ 5 मिनट तक भस्रिका प्राणायाम, 30 मिनट तक कपालभाति, 11-21 बार बाह्य प्राणायाम और 30 मिनट तक अनुलोम-विलोम करना चाहिए।

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विश्वास के साथ करना चाहिए। प्रारम्भ में प्राणायाम करते हुए जब थकान हो तो मध्य में थोड़ा विश्राम कर सकते हैं। प्राणायाम करते हुए प्रत्येक श्वास के साथ ओ३म् का ध्यान करने से लक्ष्य शीघ्र प्राप्त होगा।

अनुलोम-विलोम के बाद भ्रामरी व उद्‌गीथ भी 5-5 मिनट दिव्य तेज का ध्यान करते हुए अवश्य करें। अन्त में प्राण के साथ मन को एकाग्र करके अन्तर्यात्रा करें। इस प्रकार प्राण के साथ ओंकार के निरन्तर ध्यान से आप योग के उच्चतम क्षितिज तक पहुँच सकेंगे।

ध्यान के द्वारा पुनः पुनः किया गया ओंकार का जप साधक के अन्दर लहरें उत्पन्न करता है। गुदगुदी या हर्षदायक ये लहरें ‘प्राणमय कोश’ (स्नायुमण्डल) के माध्यम से ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ में ‘तडित् नामक’ (प्राण की ताडना से उत्पन्न कम्पन) विद्युन्मय प्रकम्प प्रकट होकर नाभि में एक ‘नाद’ (अस्फुट शब्द) उत्पन्न कर देता है,

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जिससे उदर में विशेष ऊष्मा प्रतीत होती है। उदर में उत्पन्न हुई ऊष्मा संकल्प में परिणत हो जाती है। जप-ध्यान के द्वारा उत्पन्न विशेष प्रकार का आघात (कम्पन) स्नायुमण्डल के द्वारा विद्युत्-लहरियों के रूप में प्राणमय कोश में जब प्रविष्ट होता है, तब कोई प्रवाह हमारे मस्तिष्क से चलकर स्नायुमण्डल के नाभिगत मणिपुर चक्र को प्रभावित करता है।

 

 

 

 

 

 

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