देहरादून – कुण्डलिनी-जागरण के आत्मिक लाभ की अभिव्यक्ति शब्दों में तो नहीं की जा सकती। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह एक पूर्ण आनन्द की स्थिति होती है।
इस स्थिति को प्राप्त करने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। मन में पूर्ण सन्तोष, पूर्ण शान्ति एवं परमसुख होता है। ऐसे साधक के पास बैठने से दूसरे व्यक्ति को भी शान्ति की अनुभूति होती है।
ऐसे योगी पुरुष के पास बैठने से दूसरे विकारी पुरुष के भी विकार शान्त होने लगते हैं तथा योग एवं भगवान् के प्रति श्रद्धाभाव बढ़ते हैं। इसके अतिरिक्त, जिसकी कुण्डलिनी जागृत हो जाती है, शरीर पर भी लावण्य आने लगता है।
मुख पर प्रसन्नता और समता का भाव होता है। उसकी दृष्टि में समता, करुणा तथा दिव्य भाव होते हैं। विचारों में महानता तथा पूर्ण सात्त्विकता होती है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि उसके जीवन का प्रत्येक पहलू पूर्ण पवित्र, उदात्त और महानता को छूता हुआ होता है।इस पूरी प्रक्रिया के जहाँ आध्यात्मिक लाभ हैं।
