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Lively :- उत्तराखंड के लोक पर्व इगास बग्वाल: सीएम धामी, राज्यपाल गुरमीत सिंह और पूर्व राज्यपाल कोश्यारी ने जौनसारी नृत्य पर थिरकते हुए सांस्कृतिक धरोहर को किया जीवंत

देहरादून, 1 नवंबर 2025।

देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक माने जाने वाले लोक पर्व इगास बग्वाल (बूढ़ी दीपावली) आज पूरे राज्य में हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।

दीपावली के 11 दिन बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को पड़ने वाला यह पर्व इस वर्ष 1 नवंबर को शनिवार को धूमधाम से उत्साहित हुआ।https://youtube.com/shorts/r0xNqNcM_08?si=3uDVesgx4LGdYY1P

राज्य सरकार द्वारा घोषित सार्वजनिक अवकाश के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, राज्यपाल सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह और पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

इस अवसर पर तीनों ने पारंपरिक जौनसारी नृत्य में थिरकते हुए उत्तराखंड की जनजातीय परंपराओं को नया आयाम दिया, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

इगास बग्वाल उत्तराखंड के गढ़वाल और जौनसर-भाबर क्षेत्र का प्राचीन लोक पर्व है, जो सर्दियों के आगमन और सामुदायिक एकता का प्रतीक है।

मान्यताओं के अनुसार, यह पर्व भगवान राम के अयोध्या लौटने की खबर के 11 दिन देरी से पहुंचने से जुड़ा है। गढ़वाल में जब यह संदेश पहुंचा, तो लोगों ने दीप जलाकर ‘बूढ़ी दीपावली’ मनाई।

एक अन्य कथा वीर योद्धा माधो सिंह भंडारी से जुड़ी है, जिन्होंने 1632 में तिब्बत युद्ध में विजय प्राप्त कर 11 दिन बाद गढ़वाल लौटे। उनके स्वागत में जलाए गए दीपों ने इस पर्व की नींव रखी।

इस पर्व पर घर-घर दीप प्रज्ज्वलन, गोवंश पूजा, पारंपरिक पकवानों का वितरण और लोक नृत्य-गीतों का आयोजन होता है।

पर्यावरण अनुकूल होने के कारण इसमें पटाखों का उपयोग नहीं किया जाता। भैलो (चीड़ की लकड़ियों की मशाल) घुमाकर ‘भैलो रे भैलो’, ‘काखड़ी को रैलू’ जैसे गीत गाए जाते हैं,

जबकि चांचरी और झुमेलो नृत्य सामूहिक उत्सव का हिस्सा बनते हैं। उत्तराखंड सरकार ने युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए इस पर्व पर अवकाश घोषित किया है,

जो मुख्यमंत्री धामी की ‘लोक संस्कृति संवर्धन योजना’ का हिस्सा है।

आज मुख्यमंत्री आवास पर आयोजित विशेष कार्यक्रम में सैकड़ों स्थानीय कलाकारों और जनप्रतिनिधियों ने भाग लिया।

जौनसार क्षेत्र से आए कलाकारों ने ढोल-डमरू की थाप पर जौनसारी नृत्य प्रस्तुत किया, जिसमें ऊनी चोगा, रंग-बिरंगी टोपियां और आभूषणों से सजे नर्तक-नर्तकियां प्रकृति और समुदाय की एकता का प्रतीक बने।

इस नृत्य की विशेषता इसका सामूहिक और ऊर्जावान स्वरूप है, जो विवाहों और त्योहारों में जौनसारी जनजाति की पहचान है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ( युवा नेता, जो 2021 से राज्य के 12वें मुख्यमंत्री हैं) ने पारंपरिक वेशभूषा धारण कर नृत्य में हिस्सा लिया।

उन्होंने कहा, “इगास बग्वाल हमारी देवभूमि की पहचान है। यह पर्व हमें अपनी लोक परंपराओं से जोड़ता है और युवाओं को सांस्कृतिक विरासत सौंपने का माध्यम है।”

सीएम धामी, जो पूर्व में भगत सिंह कोश्यारी के OSD रह चुके हैं, ने इस अवसर पर प्रदेशवासियों से पैतृक गांवों से जुड़ने का आह्वान किया।

राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से.नि.), जो फरवरी 2024 से पद पर हैं, ने अपनी सैन्य पृष्ठभूमि के बावजूद पूरे उत्साह से नृत्य किया।

उन्होंने कहा, “उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर हमारी शक्ति है। ऐसे आयोजन हमें एकजुट करते हैं।” पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (2018-2023 तक राज्यपाल और 2001-2002 में मुख्यमंत्री),

जिन्हें धामी अपना राजनीतिक गुरु मानते हैं, ने भी नृत्य में भाग लेते हुए कहा, “यह पर्व हमारी वीरता और एकता की याद दिलाता है।”

कार्यक्रम में भैलो खेला गया, जहां मशालों की रोशनी में लोक गीत गूंजे। मुख्यमंत्री ने कलाकारों को सम्मानित किया और कहा कि राज्य सरकार लोक कलाओं के संरक्षण के लिए नई योजनाएं लाएगी।

पूरे उत्तराखंड में इगास बग्वाल की धूम रही। देहरादून, मसूरी, हरिद्वार और पौड़ी में सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए।

जबकि देवभूमि रजत उत्सव के तहत हरिद्वार में विशेष आयोजन हुए। गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्रों में गोवंश को तेल-माला से सजाया गया, और घरों में खीर-पूड़ी का प्रसाद बांटा गया।

मुख्यमंत्री धामी ने ट्वीट कर शुभकामनाएं दीं: “इगास पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं। हमारी लोक संस्कृति को संरक्षित करें।”

यह आयोजन न केवल सांस्कृतिक उत्सव था, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व द्वारा जनता से जुड़ाव का प्रतीक भी।

यह कार्यक्रम उत्तराखंड सरकार की ‘लोक संस्कृति संवर्धन’ पहल को मजबूत करता है।

जौनसारी नृत्य जैसी जनजातीय कलाओं को मुख्यधारा में लाने से छोटे समुदायों को प्रोत्साहन मिलेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे आयोजन पर्यटन को बढ़ावा देंगे और युवाओं में सांस्कृतिक जागरूकता पैदा करेंगे।

इगास बग्वाल ने एक बार फिर साबित किया कि उत्तराखंड की मिट्टी में वीरता, संस्कृति और उत्साह की जड़ें गहरी हैं।

यह पर्व न केवल अतीत की याद दिलाता है, बल्कि भविष्य के लिए प्रेरणा भी देता है।

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