देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराएं आज भी अपनी विशिष्ट पहचान और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं।
चंपावत जिले के देवीधुरा की प्रसिद्ध बग्वाल परंपरा इसी जीवंत लोक संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों के हाथों में दिखाई दे रही पारंपरिक वस्तु ‘फर्रा’ अथवा ‘छन्तोली’ है,
जिसे बग्वाल परंपरा में पारंपरिक ढाल के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। यह केवल एक वस्तु नहीं,
बल्कि सदियों पुरानी लोक आस्था, परंपरा और सामुदायिक संस्कृति की पहचान है।
परंपरागत रूप से फर्रा/छन्तोली को बांस अथवा रिंगाल की पतली खपच्चियों से छतरीनुमा आकार में तैयार किया जाता है।
बग्वाल के दौरान प्रतिभागी इन ढालों को हाथ में लेकर पत्थरों की मार से अपना बचाव करते हैं।
समय के साथ इस परंपरा ने धार्मिक आस्था के साथ-साथ उत्तराखंड की विशिष्ट लोक संस्कृति और हस्तशिल्प की पहचान भी बनाई है।
देवीधुरा की बग्वाल को लेकर देश-दुनिया में विशेष आकर्षण रहा है। यहां की यह अनूठी परंपरा स्थानीय समुदायों की एकजुटता,
आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक मानी जाती है। फर्रा/छन्तोली जैसे पारंपरिक उपकरण इस बात के साक्षी हैं
कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति केवल पर्व और अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि स्थानीय जीवन,
शिल्प और सामुदायिक परंपराओं से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
मुख्यमंत्री और मंत्रियों के हाथों में इस पारंपरिक ढाल का दिखाई देना देवभूमि की लोक विरासत को सम्मान और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश भी देता है।
आधुनिकता के दौर में ऐसी पारंपरिक धरोहरों का संरक्षण उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
देवीधुरा की फर्रा/छन्तोली—एक ऐसी लोक धरोहर, जिसमें बांस और रिंगाल की खपच्चियों के साथ उत्तराखंड की सदियों पुरानी आस्था, परंपरा और संस्कृति भी आकार लेती है।