देहरादून – ध्यानोपयोगी आसन में बैठकर चित्र को एकाकृत करते हुए ध्यान करें कि जैसे सागर को छोड़कर बूँद रह नहीं सकती है। मैं भी उस आनन्द के सिन्धु परमेश्वर में बूँद से समुद्र रूप होना चाहता हूँ।
उसी विधाता, पिता, परमेश्वर ने हमें जीवन, प्राण, जन्म, आयु, शरीर, बुद्धि, शरीर के साधन, घर, परिवार, माता, पिता आदि सब कुछ प्रदान किया है।वही प्रभु मुझे सतत आनन्द दे रहा है।
प्रभु की शान्ति एवं परमसुख मुझपर सब और से बरस रहा है। एक पल भी वह आनन्दमयी माँ एवं परम रक्षक पिता मुझे अपने से दूर नहीं करता। मैं सदा प्रभु में हूँ और प्रभु सदा मुझमें हैं,
यह तादात्म्यभाव, तद्रूपता एवं तदाकारभाव ही हमें परम आनन्द प्रदान करेगा। भगवान् अपने आनन्द की अजस्र वृष्टि सदा कर रहे हैं। यदि हम फिर भी उस आनन्द को अनुभव न करें तो इसमें हमारा ही दोष है।
