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करें वक्रासन,मकरासन, भुजंगासन और सेतुबंधासन होगे यह लाभ

“मरीच्यासन या वक्रासन”

वक शब्द का अर्थ घुमाव है। इस आसन के अभ्यास में मेरुदण्ड की अस्थि को घुमाते हैं, जिससे अभ्यास से शरीर में कार्य करने की क्षमता को नया जीवन मिलता है।

इस आसन को करने से लाभ

मेरुदण्ड की अस्थि में लचीलापन बढ़ाता है।कब्ज एवं अग्निमांद्य (डिस्पैप्सिया) को दूर करने में सहायता प्रदान करता है।पेंक्रियाज की कार्यक्षमता को बढ़ाता है एवं मधुमेह के प्रबंधन में सहायता प्रदान करता है।

“मकरासन”

संस्कृत में मकर शब्द का अर्थ होता है मगर या घड़ियाल। इस आसन में शरीर की स्थिति मगर की आक्ति के समान हो जाती है, उसलिए इसे मकरासन कहा जाता है।

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इस आसन को करने से लाभ

पूरे शरीर को शिथिल करने में लाभदायक है।पीठ संबंधी समस्याओं को दूर करने में उपयोगी है। तनाव व चिंता से संबंधित समस्याओं के नियंत्रण में लाभदायक है।

“भुजंगासन”

भुजंग शब्द का अर्थ सांप व नाग है। इस आसन में शरीर की आकृति सांप के फन की तरह ऊपर उठती है जिसके कारण इस आसन को भुजंगासन कहते हैं।

इस आसन को करने से लाभ

तनाव प्रबंधन के लिए यह आसन सर्वश्रेष्ठ है।यह उदर की अतिरिक्त वसा को घटाता है तथा कब्जियत दूर करता है। पीठदर्द और श्वास नली से संबंधित समस्याओं को दूर करता है।

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“शलभासन”

शलभ शब्द का अर्थ टिड्डी होता है, जो एक प्रकार का कीड़ा होता है।

इस आसन को करने से लाभ:

साइटिका एवं पीठ के निचले हिस्से के पीड़ा-निवारण में सहायता प्रदान करता है।नितंबों की मांसपेशियों को सुगठित बनाता है।जांघों एवं नितंबों पर एकत्रित अतिरिक्त वसा को कम करता है, शरीर के वजन को नियंत्रित बनाए रखने में यह आसन उपयोगी है।उदर के अंगों को लाभ पहुंचाता है, पाचन में सहायता करता है।फेफड़ों की कार्यक्षमता को बढ़ाने में सहायक है।

“सेतुबंधासन”

सेतुबंध शब्द का अर्थ सेतु का निर्माण है। इस आसन में शरीर की आकृति एक सेतु की अवस्था में रहती है, इसलिए इसे यह नाम दिया गया है। इसे चतुष्यादासन भी कहा जाता है

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इस आसन को करने से लाभ

अवसाद अवस्था में दोनों कंधे गर्दन जमीन से लगे होने चाहिए। अन्तिम अवस्था में यदि जरूरत हो तो आप अपनी कमर पर हाथ रखकर अपने शरीर को सहारा दे सकते हैं।

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