देहरादून – 3 से 5 सेकेण्ड में श्वास को एक लय के साथ अन्दर भरना एवं पवित्र ओ३म् शब्द का विधिपूर्वक उच्चारण करते हुए लगभग 15 से 20 सेकेण्ड में श्वास को बाहर छोड़ना।
एक बार उच्चारण पूरा होने पर पुनः श्वास को लय के साथ 3 से 5 सेकण्ड में भीतर गहरा भरना एवं पुनः 15 से 20 सेकण्ड में ओ३म् की ध्वनिपूर्वक बाहर छोड़ना।
इस प्रकार लगभग 3 मिनट में लगभग 7 बार प्रत्येक व्यक्ति को उद्गीथ प्राणायाम अवश्य करना चाहिए। असाध्य रोगों से ग्रस्त एवं ध्यान की गहराइयों में उतरने के इच्छुक साधक 5 से 10 मिनट या इससे भी अधिक समय तक उद्गीथ प्राणायाम कर सकते हैं।
भ्रामरी एवं उद्गीथ दोनों ही सहज एवं सौम्य प्राणायाम हैं। अतः इनका यदि कोई साधक लम्बा अभ्यास भी करता है तो किसी प्रकार की कोई हानि होने की सम्भावना नहीं है।
प्रयास करें कि एक मिनट में एक श्वास तथा एक प्रश्वास चले। इस प्रकार श्वास को भीतर तक देखने का भी प्रयत्न करें। प्रारम्भ में श्वास के स्पर्श की अनुभूति मात्र नासिकाग्र पर होगी।
धीरे-धीरे श्वास के गहरे स्पर्श को भी अनुभव कर सकेंगे। इस प्रकार कुछ समय तक श्वास के साथ द्रष्टा, अर्थात् साक्षी भावपूर्वक ओंकार का जप करने से ध्यानपूर्वक करें।
