देहरादून 04 अक्टूबर 2026।
पितृ पक्ष के पावन अवसर पर आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद कर उन्हें नमन किया।
इस दौरान घरों में श्राद्ध कर्म,तर्पण और पिंडदान के साथ ही जरूरतमंदों को अन्न,वस्त्र और सामर्थ्य के अनुसार दान देकर पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और स्मरण का विशेष समय माना जाता है।
नवमी तिथि को उन पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध करने की परंपरा है, जिनका निधन हिंदू पंचांग की नवमी तिथि को हुआ हो।
परिवार के सदस्य अपने पितरों का स्मरण करते हुए उनके नाम से तर्पण करते हैं और उनकी आत्मा की शांति तथा परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं।
🪔 तर्पण और श्राद्ध से पितरों का स्मरण
पितृ पक्ष में तर्पण का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। श्रद्धालु स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पितरों का स्मरण करते हुए जल अर्पित करते हैं।
कई परिवारों में परंपरा के अनुसार तिल, कुश और जल से तर्पण किया जाता है। इसके बाद श्राद्ध कर्म और पिंडदान की प्रक्रिया संपन्न की जाती है।
धार्मिक मान्यता है कि श्राद्ध कर्म का मूल भाव केवल कर्मकांड नहीं बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान व्यक्त करना है।
यही कारण है कि पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद कर उनके जीवन और परिवार के लिए किए गए योगदान को स्मरण करते हैं।
🍚 अन्नदान और जरूरतमंदों की सहायता
नवमी श्राद्ध के अवसर पर कई परिवारों ने ब्राह्मण भोजन कराने के साथ-साथ गरीब और जरूरतमंद लोगों को भोजन कराया।
अन्न, वस्त्र तथा अन्य उपयोगी सामग्री का दान भी किया गया। धार्मिक परंपराओं में पितरों के निमित्त दान को पुण्यकारी माना गया है।
मान्यता है कि इस दौरान अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया गया दान और सेवा पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है।
हालांकि श्राद्ध कर्म में दिखावे के बजाय श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुरूप सेवा को अधिक महत्व दिया जाता है।
🌿 घर-घर हुआ पितरों का स्मरण
पितृ पक्ष के चलते सुबह से ही कई घरों में धार्मिक वातावरण देखने को मिला।
परिवारों ने अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा अन्य पूर्वजों का स्मरण किया।
कई लोगों ने अपने पैतृक स्थानों और तीर्थ क्षेत्रों में पहुंचकर भी तर्पण और श्राद्ध कर्म किए।
उत्तराखंड में हरिद्वार, ऋषिकेश सहित विभिन्न तीर्थ स्थलों पर भी पितृ कर्म के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी हुई है।
गंगा तट पर श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और पूजा-अर्चना करते हैं।
🙏 श्रद्धा और संस्कारों से जुड़ा है पितृ पक्ष
पितृ पक्ष भारतीय परंपरा में परिवार, पूर्वजों और संस्कारों से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर है।
यह समय नई पीढ़ी को अपने परिवार की जड़ों और पूर्वजों के योगदान से परिचित कराने का भी अवसर देता है।
धार्मिक दृष्टि से मान्यता है कि पितरों का स्मरण करने से परिवार में सकारात्मकता और शांति बनी रहती है।
वहीं सामाजिक दृष्टि से देखें तो पितृ पक्ष जरूरतमंदों की सहायता, अन्नदान और सेवा के माध्यम से समाज के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देता है।
पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ही श्राद्ध का मूल भाव
पितृ पक्ष की नवमी तिथि पर किया गया श्राद्ध केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उन पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है,
जिनकी स्मृतियां और संस्कार आज भी परिवार की पीढ़ियों को दिशा देते हैं।
श्रद्धालुओं ने प्रार्थना की कि सभी पितरों को शांति प्राप्त हो और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहे।
