सहारनपुर रोड पर बसी निरंजनपुर सब्जी मंडी सिर्फ सब्जियों का थोक बाजार नहीं है।
यह शहर की रसोई का आधार है, सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी का सहारा है और रोजाना हजारों लोगों की मेहनत का जीवंत प्रमाण है।
आज की इस तस्वीर में वही सच्चाई झलकती है दो मजदूर आड़ती (व्यापारियों) द्वारा कूड़े में फैंकी हुई लहसुन के छिलकों में से लहसुन की कलियों को छांट रहे हैं।
कूड़े ढेर से कुछ ठीक सी लहसुन की फांक अपने सफेद बोरे रख रहे हैं, पीछे दुकानें, मोटरसाइकिलें और साइकिलें खड़ी हैं।
वहीं सड़क पर पड़े पानी में उनका प्रतिबिंब साफ दिख रहा है। यह सिर्फ एक फोटो नहीं, मंडी की रोजमर्रा की कहानी है।
सुबह-सुबह जब शहर अभी जाग रहा होता है, तब निरंजनपुर मंडी पहले से गुलजार हो चुकी होती है।
यहां यूपी के मैदानी इलाकों, चकराता, बांदलनदी और आसपास के क्षेत्रों से ताजी सब्जियां आती हैं।
आलू, प्याज, टमाटर, लहसुन, हरी सब्जियां—सब कुछ यहीं थोक में बिकता है।
1989 में मोती बाजार से यहां शिफ्ट हुई यह मंडी करीब 18 एकड़ में फैली हुई है।
इसमें सैकड़ों दुकानें, गोदाम और लाइसेंसधारी व्यापारी सक्रिय हैं। रोजाना यहां सैकड़ों टन सब्जियां आती-जाती हैं, जो देहरादून और आसपास के घरों तक पहुंचती हैं।
लेकिन इस व्यस्तता के पीछे गरीबी की कठिन कहानी छिपी है।
फोटो में दिख रहे लोग सुबह से शाम तक धूल, धूप और कभी-कभी बरसात में भी पेट की आग शांत करने के लिए इस प्रकार व्यापारियों द्वारा फेंकी गई सब्जियों को बिनते हैं।
पंचूर वार्ता पोर्टल के माध्यम से हम इस तस्वीर को सिर्फ एक दृश्य नहीं, बल्कि एक संदेश बनाना चाहते हैं।
निरंजनपुर सब्जी मंडी हमें याद दिलाती है कि शहर की चमक के पीछे कितनी गरीबी छिपी हुई है।