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DehradunNews:- सम्पूर्ण नाडी तंत्र का आज्ञा चक्र से है सम्बन्ध

देहरादून – आज्ञा चक्र दोनों ध्रुवों के मध्य धुकुटी के भीतर है। कपालभाति, अनुलोम-विलोम एवं नाडी-शोधन आदि प्राणायामों के द्वारा प्राण तथा मन के शांत एवं स्थिर हो जाने पर ऑटोनोमिक एवं वालन्टरी नर्वस सिस्टम शान्त, स्वस्थ एवं संतुलित हो जाता है।

सम्पूर्ण नाडीतंत्र आज्ञा चक्र से ही सम्बद्ध है। आज्ञा चक्र के जागृत होने पर नाडी संस्थान पूर्णरूपेण स्वस्थ एवं सशक्त हो जाता है। मूलाधार चक्र से इडा, पिंगला तथा सुषुम्णा पृथक् पृथक् ऊ प्रवाहित होकर इस स्थान पर संगम को प्राप्त करती हैं।

इसलिए आज्ञाचक्र-स्थान को त्रिवेणी भी कहते हैं।  भाग में दो गोलियों सा ‘आज्ञा चक्र’ का स्थान है, ललाट में भरा ऊर्ध्वगामी प्रकाश ‘सुषुम्णा’ का है।

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इडा भागीरथी गंगा पिंगला यमुना नदी। तयोर्मध्यगता नाडी सुषुम्णाख्या सरस्वती ॥ त्रिवेणी संगमो यत्र तीर्थराजः स उच्यते । तत्र स्नानं प्रकुर्वीत सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

(ज्ञानसंकलिनीतन्त्र)

इडा को गंगा, पिंगला को यमुना तथा दोनों के मध्य जानेवाली नाडी सुषुम्णा को सरस्वती कहते हैं। इस त्रिवेणी का जहाँ संगम है, उसे तीर्थराज कहते हैं। इसमें स्नान करके साधक समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

यह त्रिवेणी संगम बाहर नहीं, अपितु हमारे भीतर ही है। ‘बाहर की त्रिवेणी में स्नान करने से कोई भी व्यक्ति पापमुक्त हो जाता है’ यह भ्रान्ति, मिथ्याज्ञान है।

क्योंकि यदि ऐसा होने लगे, तो किसी भी व्यक्ति को, ब्राह्मण, गुरु या भाई आदि की हत्या करके भी त्रिवेणी संगम में स्नान करने से पापमुक्त हो जाना चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं होता।

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पाप का अर्थ है ‘अपराध’, जिससे दूसरों का अहित होता हैं। अतः पाप का फल तो भोगना ही पड़ेगा। पाप करके भी यदि आप प्रायश्चित्त-रूप पुण्यकर्म करते हैं, तो भी पाप का फल दुःख-रूप तथा पुण्य का फल सुख के रूप में अलगअलग भोग-रूप में प्राप्त होगा।

इसलिए शास्त्रों में कहा है कि- अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। हाँ. यदि श्रद्धापूर्वक कोई व्यक्ति गंगा या त्रिवेणी में स्नान करें और स्नान करके संकल्प करे कि मुझे जीवन में कभी पाप-कर्म नहीं करना तो वह अपनी इसी पवित्र प्रतिज्ञा एवं संकल्प से भविष्य में पाप से बच सकता है।

परन्तु, जो अबतक किया हुआ पाप है, उससे तो फिर भी नहीं बच सकता। यह तो हुई बाह्य त्रिवेणी की बात, परन्तु यदि कोई प्राणायाम एवं ध्यान द्वारा आज्ञा चक्र में सन्निहित त्रिवेणी संगम में मन को टिकाकर भगवान् की भक्ति में, ज्ञान की गंगा में नहाता है.

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वह पाप की बात सोच भी नहीं सकता, फिर पाप करना तो बहुत दूर की बात है। इसलिए यदि वास्तव में हम पापों से मुक्ति चाहते हैं, तो प्रतिदिन आज्ञा चक्र में मन का निग्रह करके ओंकार के नाम का जप करते हुए योगाभ्यास करना चाहिए।

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